प्रगतिशील किसान:जमीन में किए नए प्रयोग, चने का उत्पादन 15 प्रतिशत बढ़ा

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जब मां की कोख में थे तो पिता चल बसे। संघर्षों के बीच जैसे-तैसे कर मां ने पाला। कुछ साल स्कूल में तो कुछ समय घर पर रहकर ही बीए तक पढ़ाई की। पढ़ाई छोड़ने के बाद मां के साथ खेती में हाथ बंटाना शुरू किया और छोटे से खेत में अब इतने नवाचार कर दिए कि जैसे किसी बड़े संस्थान से इंजीनियरिंग की डिग्री ले रखी हो। यह कर दिखाया है चित्तौड़गढ़ जिले के गांव जयसिंहपुरा के 27 वर्षीय युवा किसान नारायणलाल धाकड़ ने। साबित किया कि खेती को केवल मेहनत से नहीं, बल्कि धैर्य और नवाचार से लाभकारी बनाया जा सकता है। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े नारायण ने अपनी साढ़े तीन हक्टेयर भूमि को ही एक तरह से प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया है। पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और केमिकल के अंधाधुंध इस्तेमाल से घटते मुनाफे को देख नारायण ने तय किया कि वे लीक से हटकर काम करेंगे। कृषि वैज्ञानिकों के संपर्क में आए और अपने खेत को हनुमंत फार्म्स का नाम दिया। यहां खेती की लागत कम करने और ज्यादा उत्पादन के लिए प्रयोग शुरू किए। इंटरनेट और अपने अनुभव से कई मशीनें और तकनीक विकसित कीं। ये न केवल वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हैं बल्कि आम किसान की पहुंच में हैं।
नारायण ने सबसे पहले मोटर चलित चना प्रूनिंग मशीन बनाई। चने की फसल में अधिक पैदावार के लिए ऊपरी कली को तोड़ना जरूरी होता है, ताकि पौधों में फुटान हों। वे लंबा बढ़ने के बजाय नीचे से अधिक शाखाएं फैला सकें। इस प्रूनिंग के लिए नारायण ने एक छोटी डीसी मोटर और ब्लेड का उपयोग कर एक हाथ से चलने वाली मशीन बनाई। इस प्रयोग से उनके खेत में चने की पैदावार में 15 प्रतिशत तक वृद्धि हुई। नीलगाय और जंगली जानवरों से फसल बचाने के लिए सोलर 360 डिग्री रोटेटिंग नीलगाय रक्षक यंत्र बनाया। सौर ऊर्जा से चलने वाला यह यंत्र रातभर डरावनी आवाजें और चारों दिशाओं में घूमने वाली तेज रोशनी के जरिए जानवरों को खेत से दूर रखता है। तेल के खाली डिब्बों से देसी लाइट ट्रैप बनाया। यह बिना किसी महंगे कीटनाशक के कीटों को आकर्षित कर नष्ट कर देता है। खरपतवार हटाने के लिए पुरानी साइकिल से वीडर बना दिया। इससे मजदूरों पर होने वाले खर्च को 80 प्रतिशत तक कम कर दिया है। नारायण ने कपास और शकरकंद का ऐसा इंटरक्रॉपिंग मॉडल विकसित किया है, जो जमीन की नमी को बनाए रखता है। खरपतवार उगने ही नहीं देता। जैविक फफूंदनाशी ‘ट्राइकोडर्मा’ के प्रयोग से मिट्टी को पुनर्जीवित कर रहे हैं। इन्हीं उपलब्धियों पर कई सम्मान मिल चुके हैं। किसानों को आधुनिक खेती का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।

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