संतों के सानिध्य में हुआ कवि सम्मेलन:हास्य , करुणा और भक्ति का संगम देखने को मिला, राजस्थान के वीरों पर भी सुनाई कविता
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कुंज महोत्सव के तहत गांधी मैदान में रात्रि कालीन कार्यक्रम में वीर रस एवं धार्मिक आध्यात्मिक कविताओं से और स्रोत कवि सम्मेलन हुआ जिसमें इंदौर की अमन अक्षर दिल्ली से मानो वैशाली उज्जैन के बवंडर भीलवाड़ा से दीपक पारीक सम्मिलित हुए। संतों की उपस्थिति मे कवि सम्मेलन में कवि दीपक पारीक ने मंच से हँसी-ठिठोली के माध्यम से समाज और धर्म की बात की, साथ ही गाय और राष्ट्र के महत्व को भी याद दिलाया। कवि सम्मेलन में मज़ाक, हास्य, करुणा और भक्ति का संगम होना चाहिए। वहीं कहा कि राजस्थान के लोग बड़े मस्त और हंसमुख हैं। कोरोना में लोग घर में बैठे-बैठे झूल गए, मिठाई और खाने-पीने की यादों में खो गए, और कभी-कभी पड़ोसी के घर में फोकट में मिलने वाली चीज़ों के लिए लाइन में लग जाते हैं। उन्होंने मज़ाक में बताया कि शादी और समारोह में बुलावा नहीं मिलना या 20 गुलाब जामुन खाने के बाद डॉक्टर की हिदायत भूल जाना आम बात है। मंच पर उन्होंने कहा कि जीवन में मज़ाक, मिठास और आनंद होना चाहिए, और कवियों का काम सत्य बोलते हुए हँसी और सीख देना है। राजस्थान की हँसी और भक्ति का संगम कवि हिमांशु बवंडर ने मंच से कहा कि राजस्थान के लोग बड़े मस्त और हँसी-खुशी के प्रेमी हैं। राणा प्रताप, खाड़ी रानी, मीरा और चेतक के बलिदान को याद करते हुए उन्होंने राजस्थान को प्रणाम किया। मंच पर हँसी-मज़ाक और व्यंग्य के बीच उन्होंने संतों और गुरुओं की कृपा का महत्व बताया। पैसा छोटा मामला है, असली धन भक्ति, ज्ञान और तार्किक बुद्धि है। उन्होंने कहा, टेंशन मत लो, अटेंशन में रहो, क्योंकि जिसकी मस्ती जिंदा है उसकी हँसी जिंदा है। हिमांशु ने हँसी और संदेश का अद्भुत मिश्रण पेश किया। ब्रज की होली: मस्ती, भक्ति और कन्हैया का जादू कवि मन्नू वैशाली ने मंच से कहा कि हम मंत्री नहीं, लेकिन कृष्ण के प्रेम और भक्ति के साथ हमेशा जुड़े हैं। उन्होंने ब्रज की होली का दृश्य श्रोताओं के सामने जीवंत किया यमुना के तट पर गोपियाँ कन्हैया की मस्ती पर चर्चा कर रही हैं, कहती हैं, कन्हैया को कैसे छोड़ दें? माता भी परेशान, कन्हैया न खाएँ, न सोए, न बैठें। मंच पर कवि ने हँसी, खेल, प्रेम और भक्ति का अद्भुत संगम पेश किया, जिससे श्रोताओं को लगा कि वे खुद ही ब्रज की गलियों में होली खेल रहे हैं।
मातृभूमि और संवेदनशीलता की कविता कवि अमन अक्षर ने मंच से कहा कि भारत की सबसे बड़ी सीख यह है कि हम अपनी मिट्टी को माँ मानते हैं और माँ हमेशा अपने बच्चों के साथ जैसे व्यवहार करती है। भले तन सूख जाए, माँ हमें कभी भूखा नहीं रखती। राजस्थान की वीर भूमि में खड़े होकर उन्होंने श्रोताओं को संवेदनशील चार पंक्तियाँ समर्पित कीं, जो परिवार, पीढ़ी और सनातन संस्कृति के जुड़ाव की याद दिलाती हैं। मंच पर उन्होंने बताया कि हमारी आँखों को चश्मे की नहीं, बल्कि संवेदनाओं और जड़े हुई पीढ़ियों की समझ की जरूरत है।
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