MLA से तहसीलदार बोले- गलत बात हो जाएगी:मंत्रीजी को मिला बचपन का दोस्त; IPS की संकेतों वाली भाषा




नमस्कार दौसा में सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाया जा रहा था। इस पर विधायकजी और तहसीलदार में नोकझोंक हो गई। बारां में शिक्षामंत्री मदन दिलावर ने सड़क पर बचपन के दोस्त को देख काफिला रुकवाया और बातें कीं। सीकर में पूर्व मुख्यमंत्रीजी का स्वागत गीतों से किया गया और झालावाड़ में IPS की संकेतों की भाषा ने बड़ा मैसेज दे दिया। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. तहसीलदार और विधायक में तू-तू मैं-मैं दौसा में हाईवे पर रानी बीड़ क्षेत्र की 12 बीघा सरकारी जमीन पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया। तहसीलदार गजानंद मीणा जेसीबी लेकर अतिक्रमण हटाने पहुंचे। कार्रवाई रुकवाने के लिए कांग्रेस विधायक डीसी बैरवा पहुंचे। विधायकजी ने सोचा था कि अधिकारी उन्हें देख पहले घिघियाएगा, फिर मिमियाएगा, फिर रिरियाते हुए मजबूरन कार्रवाई करने की बात कहेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टे तहसीलदार सवा शेर निकाला। विधायक बोले- कार्रवाई रोक दो, मैं विधायक हूं। तहसीलदार लगभग गुर्राते हुए बोला- मैं तहसीलदार हूं। जमीन सरकारी है। तो मैं जमीन का मालिक हूं। विधायक ने फिर दांव चला- कोर्ट का आदेश तो होगा, वो दिखाइए। तहसीलदार फिर भारी पड़ा, बोला- मुझे कौन आदेश देगा? मैं तहसीलदार हूं। जमीन सरकारी है। तो मैं जमीन का मालिक हूं। फालतू बात मत करो। गलत बात हो जाएगी। विधायकजी सन्न रह गए। भरी सभा में घोर अपमान। तहसीलदार के तेवर ढीले ही नहीं हो रहे। विधायकजी को कोई तर्क नहीं सूझा। भीड़ में से कोई बोला- अरे तमीज से तो बात करो, ये विधायक हैं दौसा के। तब विधायकजी को विधायकी याद आई और उन्होंने गेयर बदला। लगभग चिल्लाते हुए तहसीलदार पर चढ़े। बोले- गरीबों के मकान तोड़ोगे? मुझे जेल में डालोगे? पूरा दौसा रानी बीड़ में है। विधायक का पारा चढ़ा देख तहसीलदार साहब को भी समझ आ गया कि अब अड़ने में भलाई नहीं। दूर वहां जाकर खड़े हो गए, जहां मारकूट की स्थिति में बचाने वालों की संख्या अधिक थी। 2. मंत्रीजी को मिला पुराना दोस्त दोस्त के पास जरा सा पैसा आ जाए तो वह गरीब मित्रों से बचकर चलने लगता है। उसे लगता है कि कहीं ‘मदद’ न मांग ले। कुछ रिश्तों के तार बहुत मजबूती से जुड़े होते हैं। रिश्ता नहीं, रिश्ता निभाने वाले बड़े होते हैं। दोस्ती से बड़ा रिश्ता कोई नहीं। शिक्षा मंत्रीजी किसी कार्यक्रम में शमिल होने बारां पहुंचे थे। काफिला खेतों के बीच सड़क से गुजर रहा था। वहीं चरवाहे बकरियां चरा रहे थे। अचानक मंत्रीजी ने ड्राइवर से कहा- गाड़ी रोको। एक के बाद एक काफिले की सभी गाड़ियां रुक गईं। सभी अफसर-सुरक्षाकर्मी भौंचक। यहां सुनसान में काफिला क्यों रुका? मंत्रीजी कार से उतर कर एक हमउम्र चरवाहे के पास गए और बोले- मुझे पहचाना? चरवाहा निकला शिक्षामंत्री के बचपन का दोस्त हरिश्चंद्र। दोनों दोस्त लिपट गए। खूब गलबाहियां कीं। हरिश्चंद्रजी ने काफिले के बाकी लोगों को बताया- हम बराबर उम्र के ही हैं। बचपन में खूब खेलते थे। एक साथ सब्जियां भी बेची हैं। सब्जी बेचने के लिए आवाज लगाया करते थे- मिर्ची ले लो, बैंगन ले लो। मंत्रीजी ठहाका लगाकर हंसे। दोस्त से गुजारिश की- एक बार और आवाज लगाकर बताओ। कुल मिलाकर दोनों दोस्तों की तरह ही मिले। प्रोटोकॉल दूर खड़ा देखता रहा। मंत्रीजी ने दोस्त से घर-परिवार के बारे में पूछा। पता चला कि हरिश्चंद्र की पत्नी बीमार हैं। दवा-जांच में 5 हजार खर्च कर चुके हैं। मंत्रीजी तुरंत बोले- सीधे मेरे पास चले आना। भाभी का सारा इलाज फ्री में करा दूंगा। 3. फाग के गीतों से पूर्व CM का स्वागत जयपुर से बीकानेर जाते वक्त पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सीकर होकर गुजरीं। यहां लक्ष्मणगढ़ में जब कार्यकर्ताओं को उनके आने की सूचना मिली तो उत्साह चरम पर। कार्यकर्ता जुट गए। जगह-जगह मैडम का स्वागत किया। फूल मालाएं पहनाईं। नारे लगाए। फागुन की शुरुआत हुई है, ऐसे में कार्यकर्ताओं ने आपस में ही फाग की गीतों की डिमांड की। पदाधिकारियों ने पूर्व सीएम का नाम लेकर गीत गाना शुरू कर दिया। ताली बजा-बजाकर गीत गाया गया। कार्यकर्ताओं में इतना उत्साह देखकर पूर्व सीएम भी खुश नजर आईं। 4. चलते-चलते… पुलिस की वर्दी देख कई बच्चे डर जाते हैं। सहम कर छुप जाते हैं। यह उन इलाकों के बच्चों के साथ होता है, जहां पुलिसवालों को मानवीय व्यवहार की ट्रेनिंग नहीं दी गई। कुछ पुलिसवाले वर्दी को गुंडागर्दी का लाइसेंस बना देते हैं। पुलिस के लिए जनता में विश्वास तब जागता है जब एक आम नागरिक को पुलिस से इज्जत मिलती है। झालावाड़ एसपी अमित कुमार बुडानिया ( IPS) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब घूम रहा है। एसपी साहब लॉन में बच्चों के साथ आराम से पालथी मारकर बैठे हैं। एकाध अधिकारी भी उसी तरह से घास पर बैठे दिख रहे हैं। एसपी साहब मूक-बधिर बच्चों से संकेतों की भाषा में बात कर रहे हैं। एसपी बुडानिया ने बच्चों को यकीन दिलाया कि आपने मुझे संकेतों की भाषा सिखा दी है। इसके बाद वे अपने नाम के एक-एक अंग्रेजी वर्ण को संकेत के रूप में बताते हैं और बच्चे सही की मुहर लगाते चलते हैं। एसपी साहब का नाम पूरा हुआ और बच्चे खिलखिला पड़े। इन्हीं संकेतों से उन पुलिसकर्मियों को भी समझ जाना चाहिए कि जनता का भरोसा जीतना उतना भी मुश्किल नहीं है। बस जुड़ाव जमीनी और ईमानदारी वाला होना चाहिए। और वर्दी की अकड़ खूंटी पर ही टंगी रहे तो बेहतर। इनपुट सहयोग- राघवेंद्र गुर्जर (दौसा), शुभम निमोदिया (बारां), सुरेंद्र माथुर (सीकर), बल बहादुर सिंह हाड़ा (झालावाड़)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी…



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