मुनिश्री भरत कुमारजी के दीक्षा दिवस पर जप तप से हुई वर्धापना, लाडनूं के लिए प्रस्थान

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भास्कर न्यूज |सवाई माधोपुर युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनिश्री अर्हत कुमार के सानिध्य में तेरापंथ के दशम अधिष्ठाता प्रेक्षाप्रणेता आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के दीक्षा दिवस पर आदर्शनगर स्थित तेरापंथ भवन में विशेष प्रवचन सभा का आयोजन किया गया। आज ही के दिन 25 वर्ष पूर्व मुनिश्री के सहवर्ती संत मुनिश्री भरत कुमार की दीक्षा भी आचार्य महाप्रज्ञजी के कर कमलों से हुई थी। मुनिश्री अर्हत कुमार ने कहा कि संयम ग्रहण करने से आश्रव द्वार बंद हो जाते है। एक घड़ी का शुद्ध संयम मोक्ष मार्ग के द्वार खोल देता है। दीक्षा रूपांतरण की अभिनव प्रक्रिया है। संयम की प्राप्ति केवल मनुष्य जन्म में ही प्राप्त होती है। इसलिए वह जीव भाग्यवान होता है जो संयम लेकर सीमित सुखों को त्यागकर अनंत सुखों का वरण करता है। जैन साधु की पहचान केवल केश लुंचन से नहीं बल्कि क्लेश लुंचन से हो यही अपेक्षित है। महाप्रज्ञजी जैसे महामनस्वी आचार्य के कर कमलों से दीक्षित भरत मुनि अध्यात्म की ऊंचाइयों का वरण करें यही काम्य है। अपनी दीक्षा की 25वें वर्ष की परिसंपन्नता पर भरत मुनि ने अपने दीक्षा गुरु, वर्तमान आचार्य, अर्हत मुनि, जयदीप मुनि सहित माता-पिता व संयम ग्रहण में सहयोगी व्यक्तियों का आभार व्यक्त किया। कहा कि एक छोटा सा त्याग भी जीवन बदल सकता है। एक साधु के पास संयम रूपी अक्षय निधि होती है। उसका संरक्षण व सार संभाल आवश्यक है। मुनिश्री जयदीप कुमार ने कहा कि भरत मुनि हंसमुख, मृदुभाषी व सदा नित नए के अभिलाषी है। संयम के पथ पर वही चलता जो जागरूक, सहिष्णु व आत्मा के निकट रहने वाला हो। गुरुओं के दिशा बोध से व्यक्ति अनंत सुखों को प्राप्त कर सकता है। श्रावक-श्राविकाओं ने जप तप के माध्यम से गुरु महाप्रज्ञ व भरत मुनि की वर्धापन की। एक साल के लिए त्याग तप को समर्पित नियम ग्रहण किए। मुनि बृंद सवाई माधोपुर क्षेत्र में लगभग एक माह का प्रवास पूर्ण कर गुरु आज्ञा के अनुरूप लाडनूं के लिए रवाना हुए। वे सूरवाल, भगवतगढ़, चौथ का बरवाड़ा, जयपुर होते हुए 400 किलोमीटर का पद विहार करते हुए लाडनूं पधारेंगे।

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