26 जनवरी, 2001 के दिन गुजरात के कच्छ और भुज में भीषण भूकंप आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.7 थी। करीब 700 किलोमीटर दूर तक भूकंप के झटके महसूस किए गए। इसका असर गुजरात के 21 जिलों तक हुआ था। कच्छ और भुज शहर में 12,000 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी और करीब 6 लाख लोगों को बेघर होना पड़ा था।
दैनिक भास्कर की विशेष सीरीज ‘कच्छ में भूकंप @25’ के इस एपिसोड में आज जानिए ऐसे दो लोगों की जुबानी पूरी कहानी, जो भूकंप के बाद नरेंद्र मोदी के लिए ‘गाइड’ बने। पहले व्यक्ति ने मोदी को बाइक पर बिठाकर भूकंप की तबाही दिखाई। वहीं, सीएम बनने के बाद जब मोदी चोबारी गांव पहुंचे तो दूसरे शख्स ने उन्हें पूरे गांव के पीड़ितों से मिलवाया।
पहले बात करते हैं चोबारी गांव के रामजी मेरिया की…
फोटो क्लिक किया और अगले ही मिनट भूकंप आ गया चोबारी गांव में पंचायत घर हुआ करता था, जहां बड़े अवसरों पर गांव के लोग एकत्र होते थे। 26 जनवरी 2001 को भी यहां गांव के अगुवा और छात्र ध्वजवंदन के लिए इकट्ठा हुए थे। गांव के ही रामजी मेरिया उस कार्यक्रम में एंकरिंग कर रहे थे। भूकंप आने से दो मिनट पहले उन्होंने बच्चियों की प्रार्थना करते हुए एक फोटो क्लिक की थी। इसके अगले ही मिनट भूकंप आ गया। धरती के कांपते ही इमारतें ढहने लगीं।
शुरुआत में वहां मौजूद लोगों को लगा कि दूर कहीं कोई बड़ा ब्लास्ट हुआ है, लेकिन कुछ ही पल में समझ आ गया कि यह भूकंप है। रामजी मेरिया उस समय तिरंगे को पकड़े हुए थे। खुली जगह पर होने से रामजी और कुछ लोगों की जान बच गई थी।
छोटे से गांव में 550 लोगों की मौत झटकों के थमते ही रामजी और उनके साथी लोगों की मदद के लिए भागे तो देखा कि चारों तरफ शव बिखरे पड़े थे। मलबे के नीचे कहीं किसी का हाथ दिख रहा था, कहीं सिर तो कहीं पैर। लगभग सभी मकान धराशायी हो चुके थे। भूकंप आने के दो मिनट के भीतर ही पूरा गांव तबाह चुका था। इस गांव में 550 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। भूकंप की तीव्रता इतनी भयानक थी कि घरों के बाहर दालान में बनी 2-2 फुट की दीवारें तक ढह गई थीं।
पंचायत घर से करीब 200 मीटर की दूरी पर ही रामजी मेरिया का घर था। जब वे मलबे के ऊपर से गुजरते हुए अपने घर की ओर जा रहे थे, तभी बिजली का तार उनके हाथ में आ गया। हालांकि उस समय बिजली की सप्लाई बंद थी, इसलिए कोई नुकसान नहीं हुआ।
आगे रामजीभाई की बाइक, पीछे मोदी का काफिला चोबारी गांव भूकंप का एपिसेंटर था और भूकंप के बाद पहली दिवाली थी। इसीलिए दिवाली के दिन सीएम नरेंद्र मोदी चोबारी गांव पहुंचे। उस दौरान रामजीभाई उनके साथ रहे और उन्हें यह दिखाया कि किस जगह कितना नुकसान हुआ है। रामजीभाई अपनी बाइक लेकर आगे चलते थे और मोदी की कार उनके पीछे चलती थी।
रामजी मेरिया ने बताया- जब नरेंद्र मोदी ने चोबारी में कदम रखा, तब उनके साथ पुलिस की गाड़ियां बहुत कम थीं। किसी खास सुरक्षा की जरूरत ही नहीं थी। मैं अपनी बाइक से आगे चल रहा था, पीछे उनकी कार और एक पुलिस की गाड़ी थी। चोबारी में मोदी हर उस जगह पर गए, जहां नुकसान हुआ था। नरेंद्र मोदी ने सुबह से लेकर दोपहर तक का समय चोबारी गांव में बिताया। इसके बाद रात को पास के त्रंबो गांव पहुंचे।
नरेंद्र मोदी का गला भर आया
गांव की यात्रा के दौरान जहां-जहां लोग बैठे थे, नरेंद्र मोदी खुद वहां पहुंचे और उनसे बात की। लगभग हर घर में किसी न किसी की मौत हुई थी। इसलिए लोग सदमे में थे। गांव में स्थित शिव मंदिर के पास मलबे के बीच मोदी ने एक सभा को संबोधित कर लोगों को सांत्वना दी थी।
बोलते-बोलते मोदी की आंखों में आंसू आ गए रामजीभाई बताते हैं कि मोदी पूरे गांव का दौरा करने के बाद मंदिर पहुंचे और लोगों को संबोधित किया। वहां कुछ मीडियाकर्मी भी मौजूद थे। उनसे सवाल किया गया कि आज पूरा देश दिवाली मना रहा है, लेकिन आप इस गांव में आए हैं- इसका क्या कारण है?
इस सवाल पर मोदी भावुक हो गए। मीडिया ने फिर वही सवाल किया, तब वे बस इतना ही कह पाए- आज पूरा देश दिवाली के दीये जला रहा है, लेकिन इस गांव के हर घर में जीवन का दीया बुझ गया है। यह कहते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए।
चोबारी के लोगों से मोदी का लगातार संपर्क रामजीभाई कहते हैं- एपिसेंटर होने के कारण चोबारी में नुकसान सबसे ज्यादा था। हालात देखकर नरेंद्र मोदी को एहसास हुआ कि कच्छ में कितनी बड़ी तबाही हुई है। उन्होंने सिर्फ दिवाली के दिन गांव का दौरा ही नहीं किया, बल्कि इसके बाद भी वे चोबारी के लोगों के साथ लगातार संपर्क में रहे।
रामजीभाई के बाद अब बात दिलीप देशमुख की…
एक तस्वीर आज भी इंटरनेट पर देखी जा सकती है, जिसमें नरेंद्र मोदी एक बाइक पर बैठे हुए कच्छ के भूकंपग्रस्त इलाकों का दौरा कर रहे हैं, लेकिन आमतौर पर लोग बाइक चलाने वाले शख्स का नाम नहीं जानते। दरअसल, इस शख्स का नाम है दिलीप देशमुख। दिव्य भास्कर ने दिलीप देशमुख से बातचीत कर उस दिन का पूरा घटनाक्रम जाना।
आज दिलीप देशमुख को लोग ‘दादा’ के नाम से जानते हैं। वे 1982 से RSS के प्रचारक रहे हैं। महाराष्ट्र में कुछ समय काम करने के बाद वे प्रचारक के रूप में गुजरात आए थे। शुरुआती 10 साल उन्होंने दक्षिण गुजरात में प्रचारक की जिम्मेदारी निभाई, इसके बाद 3.5 साल उत्तर गुजरात में प्रचारक के तौर पर काम किया। जून 2000 में वे कच्छ आए थे, तबसे यहीं रह रहे हैं।
साल 2004 से प्रचारक नहीं हैं। अब मंडवी तालुका के बीदड़ा गांव में एक स्कूल के संचालक हैं। फिलहाल वे फुल-टाइम फ्रीलांसर हैं और मुख्य रूप से पर्यावरण, शिक्षा और अंगदान के क्षेत्र में काम करते हैं। 2020 में उनका लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था, जिसके बाद उन्होंने अंगदान को लेकर जागरूकता अभियान शुरू किया था।
भास्कर से बातचीत में उन्होंने भूकंप के दिन की रूह कंपा देने वाली यादों को साझा किया। 26 जनवरी 2001 को वे सामखियाली में थे। भूकंप के बाद वे अगले दिन भुज पहुंच गए थे।
नरेंद्र मोदी 27 जनवरी को कच्छ पहुंच गए थे। अगली सुबह भुज के जुबिली ग्राउंड में मेरी नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई थी। मोदी ने मुझसे कहा- हमें हर जगह जाकर हालात देखने हैं। चलिए, किसी कार्यकर्ता या आम लोगों से मिलते हैं।
दिलीप देशमुख बताते हैं- इस बातचीत के बाद मैं मोदी को अपनी बाइक पर बैठाकर भुज की ओर निकल पड़ा। मुझे अच्छी तरह याद है कि हम 3 से 4 घंटे तक पूरे भुज में घूमते रहे। उनके पास कार थी, लेकिन हर जगह कार से जाना संभव नहीं था। जैसे वाणियावाड़ इलाके में आज भी कार ले जाना मुश्किल है।
इसलिए हम बाइक से गए थे। जहां मोटरसाइकिल भी नहीं जा सकती थी, वहां हम पैदल उतरकर निरीक्षण करते थे। सिर्फ बाइक से ही नहीं। जहां जरूरत लगी, वहां हम रुककर लोगों से बात भी करते थे। आज भुज पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन उस समय आइना महल क्षेत्र में उतरकर गली-गली पैदल घूमे, लोगों से मिले। यहां चारों ओर तबाही का मंजर था। जिंदा बचे लोग इलाका छोड़कर जा रहे थे।
आफ्टरशॉक के डर के बीच कार्यकर्ता के घर रुके मोदी दिलीप देशमुख कहते हैं- जब हम बाइक से घूम रहे थे, उस समय मोदी भाजपा के महासचिव थे। शाम ढल चुकी थी। भाजपा कार्यालय में रुकने की कोई व्यवस्था नहीं थी, क्योंकि वहां लोग जमीन पर चादर बिछाकर सो रहे थे। करीब शाम 7:30 बजे मैंने उनसे पूछा कि क्या आप रुकेंगे? उन्होंने कहा- हां, रुकना तो है।
इसके बाद वे भाजपा कार्यकर्ता उषाबेन मंडलकर के घर रुके। वे बताते हैं- उषाबेन का पूरा परिवार और मोहल्ले के लोग घर के बाहर सो रहे थे, लेकिन मोदी अकेले उषाबेन के घर की दूसरी मंजिल पर ठहरे थे, जबकि तब भी आफ्टरशॉक का डर बना हुआ था।
मोदी के एक फोन से कच्छ पहुंच गए 10 लाख कार्टन बिस्किट नरेंद्र मोदी ने नुस्ली वाडिया को फोन कर के भूकंप प्रभावित कच्छवासियों के लिए ब्रिटानिया बिस्किट के 10 लाख कार्टन मंगवाए थे। इस बारे में दिलीप देशमुख बताते हैं- भूकंप के बाद कई वीआईपी लोग यहां आए थे। नानाजी देशमुख के साथ नुस्ली वाडिया भी आए थे।
मुझे उस समय यह तक नहीं पता था कि नुस्ली वाडिया कौन हैं। हम पूरे दिन भर साथ रहे थे। रास्ते में उन्होंने नरेंद्र मोदी के बारे में बात की। नुस्ली वाडिया ने मुझे बताया था कि एक रात नरेंद्र मोदी का उन्हें फोन आया था।
मोदीजी ने कहा- नुस्ली, मुझे बिस्किट चाहिए। मैंने पूछा- कितने चाहिए? मोदीजी ने जवाब दिया- 10 लाख कार्टन बिस्किट चाहिए।
इसके बाद नुस्ली वाडिया ने ब्रिटानिया के बिस्किट भेजे और करीब 6 महीने तक कच्छ के लोगों ने वही बिस्किट खाए।
पुनर्वास और कच्छ के पुनर्निर्माण पर मोदी का विजन नरेंद्र मोदी ने पुनर्वास और कच्छ को फिर से खड़ा करने के लिए जो किया, उसका जिक्र दिलीप देशमुख ने भी किया। उन्होंने बताया कि पुनर्वास को लेकर नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण बिल्कुल साफ था। उनका मानना था कि जो गांव पूरी तरह ढह चुके हैं, उन्हें उसी जगह दोबारा बसाने के बजाय थोड़ी दूरी पर नई योजना और आधुनिक ढांचे के साथ बसाया जाए।
उस समय मेरी समझ इतनी नहीं थी। मैंने उनसे कहा था कि अगर गांव दूर बसाए जाएंगे तो लोगों को आने-जाने में दिक्कत होगी। इस पर मोदी जी ने मुझसे कहा- आज आपको दूरी ज्यादा लग रही है, लेकिन भविष्य में हर व्यक्ति के पास साधन होंगे, तब किसी को कुछ भी दूर नहीं लगेगा।
आज जो रिलोकेशन साइटें हैं, वे नरेंद्र मोदी का विजन हैं वे आगे बताते हैं- आज गांवों के बाहर जो रिलोकेशन साइट्स बनी हैं, वह मूल रूप से नरेंद्र मोदी का ही विजन है। भूकंप आने के करीब 8 महीने बाद नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम बने थे। उनके सीएम बनने के बाद जिस तेजी और जज्बे के साथ यहां विकास का काम हुआ, वह यहां का हरेक व्यक्ति बता सकता है। उस समय कच्छ में कोई यूनिवर्सिटी नहीं थी। बाद में कच्छ यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई। ऐसे कई अलग-अलग और दूरगामी काम मोदी के विजन की वजह से संभव हो पाए।
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