हमने अनु मलिक-जावेद अख्तर साहब से सीखा:मनोज मुंतशिर बोले- रीक्रिएटेड गानों में सिर श्रद्धा से झुका था, मिथुन ने कहा- विरासत को बढ़ाना एहतराम था
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1971 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी ‘बॉर्डर 2’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यह सिर्फ एक युद्ध फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सेनाओं के साहस, बलिदान और टीमवर्क की कहानी है। फिल्म की कहानी के साथ-साथ गानों को भी खूब पसंद किया जा रहा है। इस फिल्म के प्रसिद्ध गानों, विशेषकर ‘घर कब आओगे’ और ‘जाते हुए लम्हों’ को संगीतकार मिथुन द्वारा फिर से री-क्रिएट किया गया है, जबकि इसके बोलों को मनोज मुंतशिर शुक्ला ने लिखा है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत के दौरान मनोज मुंतशिर ने बताया कि रीक्रिएटेड गानों में हमारा सिर श्रद्धा से झुका था। वहीं, संगीतकार मिथुन ने कहा कि अनु मलिक और जावेद साहब की विरासत को आगे बढ़ाना एहतराम था। गीतकार मनोज मुंतशिर ने कहा- बॉर्डर केवल एक फिल्म नहीं है, वह भावनाओं और स्मृतियों की धरोहर है। जावेद अख्तर और अनु मलिक ने जो स्तर स्थापित किया है, उसके सामने खड़ा होना भी अपने आप में बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। मैंने और मिथुन ने अनु मलिक, जावेद अख्तर साहब जैसे बड़ों से सीखा। अब जब हमारी बारी आई तो ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्म के लिए अलग कहानी, अलग सिचुएशन को अपने शब्दों और संगीत से व्यक्त किया। हमने अपना कर्म किया, लेकिन ओरिजिनल साउंडट्रैक और फिल्म के लिए हमेशा सम्मान रहा। रीक्रिएटेड गानों में हमारा सिर श्रद्धा से झुका था। संदेसे आते हैं एक गीत नहीं बल्कि एक भावनात्मक दस्तावेज है। जावेद साहब ने उसमें मां, घर, सरहद और सैनिक की पूरी दुनिया समेट दी है। ऐसे गीत को दोहराने या बदलने का विचार कभी मन में आया ही नहीं। संगीतकार मिथुन कहते हैं- अनु मलिक और जावेद साहब की विरासत का को आगे बढ़ना बोझ नहीं, बल्कि एहतराम था। जब आप जानते हैं कि आप अनु मलिक के संगीत और जावेद अख्तर के शब्दों से जुड़ी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, तो आप बहुत सजग हो जाते हैं। हमारा प्रयास यही रहा कि श्रोता जब ‘घर कब आओगे’ और ‘जाते हुए लम्हों’ सुनेंगे तो उन्हें कहीं भी बनावट या दिखावा महसूस नहीं होगा। बता दें कि साल 1997 में रिलीज फिल्म ‘बॉर्डर’ में अनु मलिक के संगीत और जावेद अख्तर के बोल ने फिल्म के सभी गीतों को आइकॉनिक बना दिया था।
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