Amry Day 2026; Lt Gen Nathu Singh Rathore Story Explained | PM Nehru | राजस्थान के लेफ्टिनेंट-जनरल जो पंडित नेहरू से भिड़ गए थे: पूछा था- आपके पास प्रधानमंत्री पद का कितना अनुभव?; गांधी पर उठाए थे सवाल – Jaipur News
देश के बंटवारे के समय राजस्थान में जन्मे लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह सेना में थे। वे अपने बेबाक अंदाज और निडरता के कारण काफी चर्चित रहे थे। सेना के अफसरों के अनुभव पर सवाल उठाने पर उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से ही पूछ लिया था- आपके पास प्रधानमंत्री
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देश विभाजन पर महात्मा गांधी पर भी सवालों की बौछार कर दी थी। अपने सीनियर अफसरों के फैसले का विरोध करते हुए आजादी मांग रहे लोगों पर गोली चलाने तक से इनकार कर दिया था। तब उनके सीनियर अधिकारी ने कहा था- ये इलेक्ट्रिक मूंछ वाला कुछ भी कर सकता है। अंग्रेजों के कट्टर विरोधी होने के कारण उनके प्रमोशन में भी देरी हुई थी।
जयपुर में 15 जनवरी को आर्मी डे परेड है। इस मौके पर भास्कर की ‘आर्मी की कहानी’ सीरीज में आज 1947 में सेना के बेबाक और रौबदार लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह के बारे में पढ़िए।

नाथू सिंह का जन्म 1900 में डूंगरपुर के गुमानपुरा गांव में हुआ था।
लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह के जीवन के दिलचस्प किस्सों को मेजर जनरल वीके सिंह ने अपनी किताब ‘लीडरशिप इन-द इंडियन आर्मी’ में लेफ्टिनेंट में लिखा है। नाथू सिंह का जन्म राजस्थान के डूंगरपुर में साल 1900 में हुआ था।
किस्सा-1 नेहरू से पूछा था- आपके पास प्रधानमंत्री पद पर रहने का कितना अनुभव? आजादी के ठीक बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आर्मी के सीनियर अधिकारियों के साथ एक बैठक की थी। नेहरू चाहते थे कि ब्रिटिश अधिकारियों को एडवाइजर रखा जाए। पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया था।
नेहरू के इस प्रस्ताव पर लगभग सभी टॉप सेना अफसर सहमत थे। केवल नाथू सिंह ही थी, जिन्होंने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने विरोध करते हुए कहा था कि ‘यहां पर बैठे हुए सारे सेना के अफसर 25 साल से ज्यादा आर्मी में अहम जिम्मेदारियों को निभाने का अनुभव रखते हैं।’ नेहरू ने कोई जवाब नहीं दिया हालांकि आखिर में नेहरू के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया था।

किस्सा-2 कश्मीर बचाने के लिए लाहौर पर कब्जा करने का था प्लान नाथू सिंह आर्मी में मेजर जनरल बनने के बाद दिल्ली में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिलने पहुंचे थे। यह एक तरह की शिष्टाचार मुलाकात थी। उस वक्त कुछ मंत्री भी मौजूद थे। तब नाथू सिंह से कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ के हल का प्लान पूछा था।
नाथू सिंह ने कहा था- वे घुसपैठ वाले दर्रो पर कम फौज लगाएंगे, लेकिन लाहौर पर कब्जा करने के लिए पूरी फोर्स लगाएंगे। इससे पाकिस्तान पर दबाव पड़ेगा और वे कश्मीर से अपने आप भागने पर मजबूर हो जाएंगे। उनके इस आइडिया पर सब सहमत हो गए थे।
प्लान सुनते ही नेहरू गुस्सा हो गए थे। नेहरू ने कहा था- एक जनरल इस तरह का मूर्खतापूर्ण आइडिया कैसे दे सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई तरह की समस्याएं खड़ी हो सकती हैं? नेहरू ने सिरे से इस प्लान को खारिज कर दिया था।
हालांकि 1965 में ठीक इसी तरह के प्लान को तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मंजूरी दी थी। जब भारतीय सेना लाहौर की तरफ बढ़ी थी और पाकिस्तान कश्मीर में कमजोर पड़ गया था। पाकिस्तान का हमला नाकाम हो गया था।

पहले कमांडर इन चीफ जनरल केएम करिअप्पा, जनरल थिम्मैया, मानेकशॉ, सगत सिंह के अलावा राजस्थान के लेफ्टिनेंट जनरल नाथू सिंह भी उन आर्मी लीडर्स में थे। उन्होंने आजादी के वक्त सेना के मॉडर्न और भारतीय स्वरूप को बनाने में योगदान दिया था। (फोटो में कमांडर इन चीफ जनरल केएम करिअप्पा।)
किस्सा-3 गांधी जी को सवालों से घेरा था, विभाजन से नाखुश थे नाथू सिंह 1947 में देश के विभाजन के वक्त बड़ी संख्या में पाकिस्तान से शरणार्थी भारत पहुंचे थे। उस वक्त नाथू सिंह का डेरा इस्माइल खान से कुरुक्षेत्र में ट्रांसफर किया गया था। कुरुक्षेत्र के शरणार्थी शिविर में 20,000 से ज्यादा लोगों को मैनेज किया था। कैंप में साफ-सफाई से लेकर राशन और खान-पान तक का फौजी अंदाज में मैनजेमेंट किया था।
तब एडविना माउंटबेटन ने वहां का दौरा किया था। नाथू सिंह के मैनेजमेंट से वे बहुत प्रभावित हुई थीं। उन्होंने कहा था कि वे महात्मा गांधी से यहां का दौरा करने को कहेंगी। कुछ दिन बाद महात्मा गांधी कुरुक्षेत्र शरणार्थी कैंप का दौरा करने गए थे। उस दौरान नाथू सिंह ने गांधीजी पर सवालों की झड़ी लगा दी थी।
नाथू सिंह ने गांधी से पूछा था- आज आपके अहिंसा के सिद्धांत का क्या हुआ। जब हर जगह हिंसा हो रही है। आपने 1921 में कहा था कि एक साल में आजादी मिल जाएगी लेकिन क्या हुआ?
गांधीजी इन सवालों का कोई जवाब नहीं दे सके थे। नाथू सिंह देश के विभाजन के सख्त खिलाफ थे। वे आजादी के आंदोलन में सक्रिय कांग्रेस के तमाम नेताओं को जानते थे। उनसे सहानुभूति रखते थे, लेकिन देश के विभाजन से वे बेहद खफा थे।

किस्सा-4 हैदराबाद ऑपरेशन की प्लानिंग में बड़ा रोल
हैदराबाद के नवाब ने स्वतंत्र राज्य बनाने की घोषणा की थी। उस वक्त सरकार ने हस्तक्षेप कर दबाव बनाया था। 1947 में नाथू सिंह मेजर जनरल बनाए गए थे। उनको साउथ में पोस्टिंग दी गई थी। उन्होंने हैदराबाद ऑपरेशन की प्लानिंग की थी। 15 अगस्त 1947 में देश को आजादी मिली। उस वक्त नाथू सिंह डेरा इस्माइल खान में पोस्टेड थे। तब वह ब्रिगेडियर थे। इसके बाद उन्हें प्रमोशन मिला था।
किस्सा-5 अंडमान में जापानी सेना से सरेंडर करवाया था
1945 में दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के वक्त नाथू सिंह 1/7 राजपूत रेजिमेंट की बटालियन को अंडमान में कमांड कर रहे थे। उन्होंने जापानी ट्रूप का वॉइस एडमिरल तिजोहरा से सरेंडर करवाया था। यह वह दौर था,जब अंडमान से ही उन्होंने तत्कालीन अंग्रेज सेनाध्यक्ष को लेटर लिखकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी के जवानों के ट्रायल का विरोध किया था।
इस ट्रायल की खामियों को उजागर किया था। पद पर रहते हुए लिखे गए इस लेटर को उस वक्त सार्वजनिक नहीं किया था। सुप्रीम कमांडर को सीधे लेटर लिखना अनुशासनहीनता माना जाता है, लेकिन इस मामले में अंग्रेज अफसर ने लेटर को आधिकारिक रूप से नहीं लेकर व्यक्तिगत लिया था।

ये फोटो 1945 की है, जब नाथू सिंह 1/7 राजपूत रेजिमेंट की बटालियन को अंडमान में कमांड कर रहे थे।
किस्सा-6 सीनियर अंग्रेज अफसर ने कहा था- इलेक्ट्रिक मूंछ वाला कुछ भी कर सकता
नाथू सिंह को 20 अक्टूबर 1946 को छिंदवाड़ा में 9/7 राजपूत में भेजा गया था। उन्होंने बटालियन का चार्ज लिया था। उस वक्त इस बटालियन को युद्ध लड़ने के लिए अनफिट करार दिया जा चुका था।
नाथू सिंह ने इस बटालियन को वापस टेंड किया था। नतीजा ये रहा था कि यह जल्द युद्ध के लिए तैयार मानी गई थी। उस समय इंडियन डिवीजन के जीओसी टाइगर आर्टिस्ट थे। माना जाता था कि उन्हें खुश करना बहुत मुश्किल था।
वे नाथू सिंह के काम से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने सबके सामने उन्हें सैल्यूट किया था। एक सीनियर ऑफिसर का जूनियर को इस तरह सैल्यूट करना सेना में बड़ी बात मानी जाती है।
9/7 बटालियन से जब नाथू सिंह का ट्रांसफर हुआ था। तब उनकी गैर-मौजूदगी में जीओसी ने बटालियन का दौरा किया था। उन्होंने नाथू सिंह के लिए कहा था कि आपके पिछले सीओ जिसकी इलेक्ट्रिक मूंछे हैं, वो कुछ भी कर सकता है।

आर्मी में ब्रिटिश अफसरों के साथ नाथू सिंह की फोटो। नाथू सिंह पीछे लाइन में लाल गोले में।
किस्सा-7 असहयोग आंदोलन में आंदोलकारियों पर गोली चलाने से किया था मना
नाथू सिंह यूपी में तैनात थे। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें आंदोलन को दबाने को कहा गया था। नाथू सिंह कांग्रेस नेताओं को जानते थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब नेता रैली निकाल रहे थे तो उन्होंने कांग्रेस नेताओं को कह दिया कि वे दूसरा रूट ले लें। जब यह बात कमांडिंग ऑफिसर को पता लगी तो अगले दिन उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने को कहा था। नाथू सिंह ने इस पर आपत्ति की थी।
उन्होंने दूसरे अफसर को यह काम देने को कहा था, लेकिन सीओ ने मना कर दिया था। आदेश नहीं मानने पर नाथू सिंह को कोर्ट मार्शल करने की धमकी दी गई थी। इसके बावजूद नाथू सिंह ने आंदोलनकारियों का दमन करने के किसी भी आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया था।
नाथू सिंह की इस नाफरमानी को जिला कमांडर मेजर जनरल ब्रूस इस्कोर्ट को रिपोर्ट किया गया था। नाथू सिंह ने उनके सामने भी अपना निर्भीकता से पक्ष रखा और तर्क दिया था कि आयरलैंड में भी तो इसी तरह प्रदर्शन होते हैं। इस्कॉर्ट खुद आइरिश थे, उन्हें यह तर्क पसंद आया और उन्होंने नाथू सिंह के स्टैंड को सही ठहराया था।

किस्सा-8 अंग्रेज विरोधी विचार, प्रमोशन में देरी
राष्ट्रवादी विचारों के कारण नाथू सिंह के प्रमोशन में कई बार देरी की गई थी। नाथू सिंह की सेवा को 20 साल हो चुके थे। इस समय तक उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल तक प्रमोट हो जाना चाहिए था। इसके बावजूद उनके प्रमोशन में जानबूझकर एक साल की देरी की गई थी। वे कांग्रेस नेताओं के संपर्क में थे और एंटी ब्रिटिश विचार रखते थे।
मेजर जनरल वीके सिंह लिखते हैं- नाथू सिंह ब्रिटिशर्स को पसंद नहीं करते थे। इंग्लैंड में उन्होंने खुद को कभी कम महसूस नहीं किया था। कई बार उन्होंने खुलकर अपने विचार रखे थे। उनकी ब्रिटिश विरोधी मानसिकता की वजह से ही उन्हें सर्विस के दौरान भी कई बार दिक्कतें आई थीं।

किस्सा-9 पेशावर क्लब में भारतीय अफसरों को परमानेंट मेंबर नहीं मानने पर किया था विरोध
1930 में नाथू सिंह कैप्टन के पद पर प्रमोट हुए थे। प्रमोट होकर नाथू सिंह वापस 1/7 राजपूत में वजीरिस्तान के रामजक में पोस्टेड हुए थे। इस बटालियन को 1930 में पेशेवर भेजा गया था। उस वक्त भारतीय अफसर ऑफिसर्स मेस के मेंबर थे लेकिन उन्हें क्लब की मेंबरशिप नहीं दी जाती थी।
क्लब की मेंबरशिप केवल यूरोपियंस को ही दी जाती थी। नाथू सिंह को यह देखकर बहुत बुरा लगा था। 1933 में भारतीय अफसरों ने परमानेंट मेंबरशिप के लिए अप्लाई किया था, लेकिन उन्हें मना कर दिया गया था। नाथू सिंह को यह बहुत बुरा लगा था। तब उन्होंने अपनी मेस मेंबरशिप से इस्तीफा दे दिया था। बाद में हाई लेवल पर यह मामला सुलझा लिया गया था।

राजनेताओं से थे अच्छे संबंध
किस्सा-1 सरोजनी नायडू को मां कहते थे नाथू सिंह
1926 में नाथू सिंह की 107 राजपूत में पोस्टिंग थी। ये ट्रेनिंग बटालियन थी और उन्हें फतेहगढ़, फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में पोस्टिंग दी गई थी। इस तैनाती के दौरान उनकी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं से मुलाकात हुई थी। वे मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और सरोजिनी नायडू से कई बार मिले थे। उस वक्त भारतीय सेना के भारतीयकरण को लेकर बनी स्किन कमेटी के सामने सुनवाई के दौरान नेताओं से मुलाकात होती थी।
सरोजनी नायडू को वे मां कहते थे। आजादी के बाद नायडू जब यूपी की राज्यपाल बनी थीं, तब नाथू सिंह वहां पोस्टेड थे। तब भी राष्ट्रीय सुरक्षा और मिलिट्री मजबूत करने को लेकर उनके बीच कई बार पत्र व्यवहार हुआ था। लेटर के नीचे नायडू ने तुम्हारी मां लिखा था।
किस्सा-2 साथी कैडेट ‘फौजी गांधी’ कहते थे
वीके सिंह लिखते हैं- ब्रिटिश शासन ने उन्हें एक बागी के तौर पर देखा था। उनके भारतीय साथी उन्हें फौजी गांधी कहकर पुकारते थे। इस वक्त तक महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया था। हालांकि नाथू सिंह गांधी के बहुत से विचारों से असहमत थे, लेकिन वे गांधी की देशभक्ति के कारण उन्हें पसंद करते थे।
किस्सा-3 1926 में सेना से इस्तीफा देने वाले थे नाथू सिंह
नाथू सिंह अंग्रेजों की सेना में काम करने के इच्छुक नहीं थे। मोतीलाल नेहरू के साथ फतेहगढ़, फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) में नाथू सिंह के घर पर लंबे दौर की बैठक हुई थी। यहां पर उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों और उनके परिवारों से भी मुलाकात की थी। मोतीलाल नेहरू ने उन्हें राजनीति जॉइन करने की बजाय आर्मी में ही रहने की सलाह दी या फिर डूंगरपुर लौटकर स्टेट सर्विस में काम करने का विकल्प दिया था। नाथू सिंह ने मोतीलाल नेहरू की सलाह को माना और आर्मी में रहने का फैसला बरकरार रखा था।

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