बीकानेर शहर के पास इन दिनों दुनियाभर से आए गिद्धों (वल्चर) ने डेरा डाल रखा है। मंगोलिया, कजाकिस्तान और रूस समेत कई देशों से पाकिस्तान होते हुए करीब 5 हजार किलोमीटर का सफर तय कर आए ये पक्षी शहर के पास जोड़बीड़ एरिया में हैं।
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खास बात यह है कि 5 साल के भीतर यहां आने वाले गिद्धों की तादाद दोगुनी हो गई है। कोरोना काल यानी साल 2020 में यहां 4 हजार से ज्यादा गिद्ध आए थे। इस बार इनकी संख्या 10 हजार तक पहुंच गई है।
बीकानेर का जोड़बीड़ वल्चर कंजर्वेशन सेंटर भारत के महत्वपूर्ण गिद्ध संरक्षण क्षेत्रों में गिना जाता है। ऐसे पक्षियों के लिए सुरक्षित होने के कारण इसे ‘गिद्धों का स्वर्ग’ भी कहा जाता है।
सर्दी के मौसम में यहां मध्य एशिया और यूरोप से सिनेरियस वल्चर भी पहुंच गए हैं। इन्हें दुनिया के सबसे बड़े गिद्धों में गिना जाता है। हिमालयन गिफ्रॉन के अलावा लाल सिर वाला किंग वल्चर भी दिखाई दिया है।
पक्षी दिवस (5 जनवरी) पर पढ़िए खास रिपोर्ट
बीकानेर के जोड़बीड़ एरिया के आसमान में गिद्ध कुछ इसी तरह मंडराते रहते हैं।
50 बीघा में फैला गिद्ध संरक्षण क्षेत्र बीकानेर का जोड़बीड़ भारत के महत्वपूर्ण गिद्ध संरक्षण क्षेत्रों में गिना जाता है। अब तो इसे गिद्धों का स्वर्ग भी कहा जा रहा है, क्योंकि सबसे भरोसेमंद जगह बीकानेर का जोड़बीड़ ही है। इस सीजन में मध्य एशिया और यूरोप से सिनेरियस वल्चर भी यहां पहुंच गए हैं। ये दुनिया के सबसे बड़े गिद्धों में से एक हैं। इसके अलावा पीली चोंच वाला इजिप्शियन वल्चर, लाल सिर वाला किंग वल्चर जैसी प्रजाति भी यहां मेहमान के रूप में आए हैं।
जोड़बीड़ के करीब 50 बीघा एरिया में संरक्षण केंद्र बनाया गया है, जहां गिद्धों को सब कुछ मिल रहा है। शहरभर में मरने वाले आवारा पशुओं को यहीं पर फेंका जाता है। इन गिद्धों के लिए सबसे बेहतर भोजन यही है।
प्रशासन ने मृत पशुओं की चमड़ी उतारने का ठेका भी दिया है। ऐसे में वल्चर को यहां भोजन आसानी से मिलता है और कठोर चमड़ी तोड़नी नहीं पड़ती। इसी कारण ये वल्चर करीब 4 से 5 हजार किलोमीटर की दूरी तय करके बीकानेर आते हैं।
एक्सपट्र्स का कहना है- दुनिया में गिद्धों की करीब 23 प्रजातियां है, जिनमें से करीब 15 प्रजातियां इस समय बीकानेर आई हुई हैं।
आर्मेनिया, रूस सहित 50 देशों से आते हैं विशेषज्ञों के अनुसार- दिसंबर से फरवरी तक यूरो-एशिया जोन के देशों में भारी बर्फबारी होती है। ऐसे में ये पक्षी उड़कर कम ठंड वाले इलाकों में आते हैं।
इन देशों में अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, चाइना, जॉर्जिया, ईरान, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूनाइटेड अरब अमीरात, मंगोलिया, पाकिस्तान, रशियन फेडरेशन, सऊदी अरब, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम, उज्बेकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, इराक, म्यांमार, नेपाल, ओमान, कतर, कुवैत, किर्गिस्तान, मालदीव, यमन सहित अन्य देशों के गिद्ध भी जोड़बीड़ क्षेत्र में देखे गए हैं।
खाने और अनुकूल मौसम की तलाश में यह रूस जैसे देशों से अफगानिस्तान से होते हुए पाकिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश करते हैं, जिन्हें बीकानेर के जोड़बीड़ में भरपूर भोजन मिलता है।
हिमालयन गिफ्रॉन समेत करीब 15 प्रजातियों ने जोड़बीड़ में डेरा जमाया है।
हिमालयन गिफ्रॉन और यूरेशियन हुपो भी पहुंचा दुनियाभर में गिद्धों की करीब 23 प्रजातियां है, जिनमें से जोड़बीड़ पर 15 से अधिक प्रजातियों के गिद्ध पहुंचे हैं। इनमें हिमालयन गिफ्रॉन, इजिप्शियन वल्चर, टोनी ईगल, येलो आइड पिजन, स्टेपी ईगल, यूरेशियन हुपो, लेगर फाल्कन, व्हाइट ईयर्ड बुलबुल, कॉमन बेबलर, ब्लैक रेड स्टार्ट, लिटल आईग्रेट, सिनेरियस वल्चर, रोजी स्टर्लिंग, कॉमन मैना, डेजर्ट व्हीटर, ग्रे फ्रेंकोलिन, लाफिंग डॉ, इंपीरियल ईगल खास तौर पर शामिल है।
गुजरात से स्टडी के लिए आए रिसर्चर मितुल देसाई ने बताया- यहां आने वाली प्रजातियों में यूरोशियन ग्रिफॉन, सिनेरियस वल्चर, इजिप्शियन ग्रिफॉन यहां सबसे ज्यादा आ रहे हैं। यहां इजिप्शियन वल्चर तो स्थानीय है, लेकिन शेष सभी विदेशी हैं।
विदेशी पक्षी फरवरी के बाद वापस अपने देश चले जाएंगे। बीकानेर की व्यवस्था पूरे देश में एक उदाहरण है। ऐसा ही काम पूरे देश में होना चाहिए। ईको सिस्टम की सबसे टॉप चेन ‘वल्चर’ ही हैं।
2008 से जोड़बीड़ कंजर्वेशन एरिया, इसलिए गिद्ध बढ़ रहे पूर्व उपवन संरक्षक और जोड़बीड़ के प्रभारी रह चुके रामनिवास कुमावत के अनुसार- जोड़बीड़ को वन विभाग ने साल 2008 में रिजर्व और कंजर्वेशन एरिया घोषित किया था। इसके बाद से क्षेत्र में गिद्धों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
व्हाइट बैक वल्चर, किंग वल्चर भी देखने को मिल रहे हैं, जो लुप्त होने की कगार पर हैं। इनके अलावा दूसरे वल्चर भी बड़ी संख्या में आते हैं। व्हाइट ईगल भी देखा गया है। सफेद बगुले भी बड़ी संख्या में आते हैं।
बीकानेर के जनसंपर्क अधिकारी और पक्षी प्रेमी सुरेश बिश्नोई ने बताते हैं- इस सेंटर को बड़े पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सकता है। आज भी जब यहां सैकड़ों पर्यटक आ रहे हैं। प्रयास किए जाएं तो संख्या बढ़ सकती है। एक साथ इतनी प्रजातियों के वल्चर देखना रोमांचक है।
बीकानेर के जोड़बीड़ कंजर्वेशन एरिया में मृत पशुओं को फेंका जाता है। ऐसे में गिद्धों को यहां भरपूर खाना मिलता है।
5 जनवरी को मनाते हैं राष्ट्रीय पक्षी दिवस हर साल 5 जनवरी को भी ‘राष्ट्रीय पक्षी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत मुख्य रूप से अमेरिका से 2002 में हुई थी, लेकिन अब भारत सहित दुनिया के कई देशों में प्रकृति प्रेमी इस दिन पक्षियों के अधिकारों और उनके संरक्षण के लिए कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इसमें किसी पक्षी की बजाय सभी पक्षियों के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास किया जाता है।