दुर्ग पर अब नहीं बनेगा बायोलॉजिकल पार्क:अब नई लोकेशन पर जगी उम्मीद, वन विभाग ने 35 हेक्टेयर का भेजा नया प्रस्ताव




चित्तौड़गढ़ शहर को बायोलॉजिकल पार्क की सौगात देने की दिशा में वन विभाग ने एक नई कोशिश शुरू की है। गांधीनगर स्थित स्मृति वन से मोहर मंगरी तक, चित्तौड़गढ़ दुर्ग की तलहटी में करीब 35 हेक्टेयर क्षेत्र में बायोलॉजिकल पार्क विकसित करने का प्रस्ताव वन विभाग ने राज्य सरकार को भेज दिया है। यह इलाका हरियाली से घिरा हुआ है और यहां तक पहुंचने के लिए स्मृति वन के पीछे से सीधा और सुगम रास्ता भी उपलब्ध है। वन विभाग का मानना है कि यह स्थान वन्यजीवों के लिए अनुकूल रहेगा और शहरवासियों व पर्यटकों को एक नया प्राकृतिक पर्यटन स्थल मिल सकेगा। हालांकि, इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला अब बजट और सरकार की मंजूरी पर निर्भर करेगा। मृगवन पर अब हमेशा के लिए लगा विराम दूसरी ओर, चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर स्थित मृगवन को बायोलॉजिकल पार्क के रूप में विकसित करने का सांसद सीपी जोशी का सपना अब पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने साफ तौर पर मृगवन क्षेत्र में किसी भी प्रकार के विकास काम के लिए एनओसी देने से इनकार कर दिया है। ASI का तर्क है कि मृगवन विश्व धरोहर चित्तौड़गढ़ दुर्ग परिसर में स्थित है, जहां किसी भी तरह का नया निर्माण या विकास कार्य नियमों के तहत संभव नहीं है। इसके साथ ही मृगवन को लेकर लंबे समय से चल रही उम्मीदों पर विराम लग गया है। 9 साल से बंद पड़ा ऐतिहासिक मृगवन चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर करीब 35 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला मृगवन पिछले करीब 9 वर्षों से बंद पड़ा है। 26 अगस्त साल 2016 में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने मृगवन का पंजीकरण नहीं होने के कारण इसे बंद करने के आदेश जारी कर दिए थे। इसके बाद से यहां पर्यटकों का प्रवेश पूरी तरह बंद हो गया। कभी देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा मृगवन अब धीरे-धीरे उजाड़ होता जा रहा है। वन विभाग के अधिकारियों की पूर्व की लापरवाही को भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। 1971 में रिलोकेशन सेंटर के रूप में हुई थी शुरुआत मृगवन की स्थापना 4 अप्रैल 1971 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने की थी। इसका उद्देश्य सांभर और चीतल जैसे वन्यजीवों का संरक्षण करना और उनके वंश को बढ़ाकर उन्हें अभयारण्यों और जन्तुआलयों में भेजना था। मृगवन शुरू से ही रिलोकेशन सेंटर के रूप में संचालित रहा, जहां वन्यजीव पिंजरों में बंद नहीं रहते थे, बल्कि खुले क्षेत्र में आराम से विचरण करते थे। करीब 139 बीघा क्षेत्र में फैला यह मृगवन सालों तक पर्यटकों को प्रकृति और वन्यजीवों से रूबरू कराता रहा। मान्यता के चक्कर में हुई बड़ी गलती साल 1993 में वन विभाग के अधिकारियों ने मृगवन को चिड़ियाघर के रूप में मान्यता दिलाने के लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से पत्राचार शुरू किया। इसका मकसद यह था कि मान्यता मिलने पर बजट मिल सके। बजट की कमी के चलते यहां सशुल्क प्रवेश भी शुरू कर दिया गया। केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने मृगवन को सिर्फ चिड़ियाघर के रूप में संचालित करने की मान्यता नहीं दी और उसकी मंशा भी यही है कि यदि चिड़ियाघर के रूप में इसका संचालन किया जा रहा हो तो इसे बंद कर दिया जाए। वैसे यह मृगवन शुरू से ही रिलोकेशन सेंटर रहा है। लेकिन अधिकारियों की एक गलती भारी पड़ गई और ये रिलोकेशन सेंटर बंद हो गया। इसीलिए लगाए गए थे ताले साल 2016 में केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को पत्र लिखकर निर्देश दिए कि मृगवन चिड़ियाघर की श्रेणी में नहीं आता। पत्र में कहा गया कि यहां से लंगूर, सांभर, हिरण, चीतल, नेवला और खरगोश जैसे वन्यजीवों को हटाकर मृगवन को तत्काल प्रभाव से बंद किया जाए। इसके बाद मुख्य वन संरक्षक उदयपुर ने भी आदेश जारी कर मृगवन को बंद करा दिया और पर्यटकों का प्रवेश रोक दिया गया। तभी से मृगवन पर ताले लटके हुए हैं। सांसद सीपी जोशी की कोशिशें रहीं नाकाम सांसद सीपी जोशी ने मृगवन को दोबारा शुरू कराने और इसे बायोलॉजिकल पार्क या स्मृति वन के रूप में विकसित करने के लिए कई बार कोशिश की। उन्होंने लोकसभा में नियम 377 के तहत इस मुद्दे को उठाया और केंद्रीय मंत्रियों से भी मांग की। सांसद का तर्क था कि चित्तौड़गढ़ के आसपास घने जंगल हैं और मृगवन को विकसित कर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। लेकिन ASI की सख्ती और नियमों के चलते उनकी कोशिशें सफल नहीं हो सकीं। नई लोकेशन पर टिकी उम्मीदें मृगवन पर ASI की एनओसी नहीं मिलने के बाद सांसद सीपी जोशी ने वन विभाग को वैकल्पिक स्थान तलाशने के निर्देश दिए थे। इसके तहत वन विभाग ने अब दुर्ग की तलहटी में नई लोकेशन चिन्हित कर बायोलॉजिकल पार्क का प्रस्ताव भेजा है। टेरिटोरियल एरिया के डीएफओ राहुल झांझरिया का कहना है कि यह क्षेत्र हरियाली से घिरा है और यहां वन्यजीवों को अच्छा प्राकृतिक वातावरण मिलेगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले बजट में इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है या नहीं।



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