The Kanwar art, passed down for generations, will now be lost, with only four artisans left in Rajasthan.
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बकुल महेश माथुर. जयपुरकुछ ही क्षण पहले
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इस कला से जुड़े ज्यादातर कारीगर अब पेंटिंग, फर्नीचर या दूसरे लकड़ी के काम करने लगे हैं।
जब घरों में टीवी या मोबाइल नहीं हुआ करते थे, तब गांव-गांव जाकर पौराणिक कथाएं सुनाने का काम कांवड़ कला करती थी। लकड़ी से तह होने वाला मंदिर (फोल्डेबल) बनाया जाता था। इन कांवड़ (मंदिरों) को लेकर जब कांवड़िया भाट समुदाय के लोग घर-घर जाते थे तो सभी एक साथ बैठकर गीतों के साथ रामायण, महाभारत और देवी-देवताओं की कथाएं सुनते थे।
कांवड़ पूजनीय भी था और कीमती भी, लेकिन अब वही कला अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। पूरे राजस्थान में इस कला के सिर्फ चार कारीगर बचे हैं। वह भी सिर्फ कला से भावनात्मक जुड़ाव और यादों को सहेजने के लिए।
कांवड़ कला का मुख्य केंद्र चित्तौड़गढ़ से करीब 22 किमी दूर बस्सी गांव रहा है। आज बस्सी में एक भी ऐसी दुकान नहीं है, जहां कांवड़ बिकता हो, क्योंकि खरीदार नहीं है। इस कला से जुड़े ज्यादातर कारीगर अब पेंटिंग, फर्नीचर या दूसरे लकड़ी के काम करने लगे हैं। इस कला को सरकार की सराहना तो खूब मिली, लेकिन संरक्षण कभी नहीं मिला।


