हमारी कांवड़ कला:अवॉर्ड तो खूब मिले लेकिन सरकार का संरक्षण नहीं, सिर्फ 4 कारीगर बचे, पीढ़ियों की कला अब खत्म हो जाएगी




जब घरों में टीवी या मोबाइल नहीं हुआ करते थे, तब गांव-गांव जाकर पौराणिक कथाएं सुनाने का काम कांवड़ कला करती थी। लकड़ी से तह होने वाला मंदिर(फोल्डेबल) बनाया जाता था। इन कांवड़ (मंदिरों) को लेकर जब कांवड़िया भाट समुदाय के लोग घर-घर जाते थे तो सभी एक साथ बैठकर गीतों के साथ रामायण, महाभारत और देवी-देवताओं की कथाएं सुनते थे। कांवड़ पूजनीय भी था और कीमती भी, लेकिन अब वही कला अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। पूरे राजस्थान में इस कला के चार कारीगर बचे हैं। वह भी सिर्फ कला से भावनात्मक जुड़ाव और यादों को सहेजने के लिए। कांवड़ कला का मुख्य केंद्र चित्तौड़गढ़ से करीब 22 किमी दूर बस्सी गांव रहा है। आज बस्सी में एक भी ऐसी दुकान नहीं है, जहां कांवड़ बिकता हो, क्योंकि खरीदार नहीं है। इस कला से जुड़े ज्यादातर कारीगर अब पेंटिंग, फर्नीचर या दूसरे लकड़ी के काम करने लगे हैं। इस कला को सरकार का संरक्षण भी नहीं मिला। 10 साल से किसी सरकारी एम्पोरियम ने कांवड़ नहीं खरीदी और 8 साल से सामान्य ग्राहक भी नहीं अगर आप ऐसी किसी कला से जुड़े हैं जो अब अपने आखिरी दौर में है तो व्हाट्सएप नंबर पर 9340931502 पर मैसेज करें। हम आपको कॉल करेंगे।उदयपुर में रहने वाले कलाकार बालकृष्ण बसायती बताते हैं- नौवीं पीढ़ी का कलाकार हूं, और आखिरी भी। मैं 17 साल का था, जब पहली कांवड़ बनाई। उस समय काम बहुत था, अब बिल्कुल नहीं। 10 साल से किसी सरकारी एंपोरियम ने भी कांवड़ नहीं खरीदी और 8 साल से सामान्य ग्राहक भी नहीं। अब दीवारों पर पेंटिंग बनाता हूं। कांवड़ में मेहनत बहुत है। लकड़ी लाओ, काटो, बारीक चित्र बनाओ, फिर सभी हिस्सों को जोड़ो। छोटे-छोटे चेहरे और दृश्य बनाना सबसे कठिन। इसी मेहनत की वजह से कांवड़ की कीमत 2 हजार से 80 हजार रु. तक पहुंच जाती है। कांवड़ कला के लिए 2019 में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले द्वारका प्रसाद बताते हैं- मेरे दादा और पिता के बाद मेरा परिवार कला से जुड़ा रहा। पहले घास से हरा, केसूल से लाल, खड़िया से सफेद रंग बनाते थे, चमक के लिए चंद्ररस बनाते थे, अब रासायनिक रंग हैं। आम या अड़ूसा की लकड़ी से कांवड़ बनाए जाते हैं। मेहनत बहुत है और खरीदार 100 में कोई एक। जैसे ही कीमत बताते हैं, लोग पीछे हट जाते हैं, क्योंकि कांवड़ को जरूरत की चीज नहीं माना जाता। इसलिए नई पीढ़ी की इस कला में रुचि नहीं बची है।



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