मनरेगा में बदलाव के खिलाफ कांग्रेस का हल्लाबोल:कलेक्ट्रेट पर कस्सी-परात के साथ प्रदर्शन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कुचलने की साजिश" – रीटा चौधरी
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केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) में किए गए संशोधनों और नए प्रावधानों के विरोध में सोमवार को झुंझुनूं जिला कलेक्ट्रेट पर कांग्रेस ने जोरदार प्रदर्शन किया। मण्डावा विधायक और कांग्रेस जिलाध्यक्ष रीटा चौधरी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और मनरेगा मजदूर हाथों में कस्सी, परात और गेती लेकर पहुंचे। प्रदर्शन के दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई और नए एक्ट को मजदूर विरोधी करार दिया गया।
“ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कुचलने की साजिश” – रीटा चौधरी प्रदर्शन को संबोधित करते हुए जिलाध्यक्ष रीटा चौधरी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इस कानून को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने के उद्देश्य से लाए थे। लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार अपनी जिद के कारण गरीब मजदूरों और ग्रामीण परिवारों को कुचलने का काम कर रही है। नए कानून पर उठाए गए प्रमुख सवाल विधायक रीटा चौधरी ने नए प्रावधानों की खामियों को गिनाते हुए केंद्र को घेरा। पहले मनरेगा का शत-प्रतिशत पैसा केंद्र सरकार वहन करती थी, लेकिन अब नए प्रावधान के अनुसार केंद्र 60% हिस्सा देगी और 40% भार राज्य सरकार पर डाल दिया गया है। रीटा चौधरी ने तर्क दिया कि प्रदेश पहले से ही भारी कर्ज में डूबे हैं, ऐसे में राज्य सरकारें इस खर्चे को वहन नहीं कर पाएंगी, जिससे नरेगा योजना दम तोड़ देगी।
राजनीतिक भेदभाव की आशंका: चौधरी ने आरोप लगाया कि नए सिस्टम से उन क्षेत्रों के साथ भेदभाव होगा जहाँ कांग्रेस की सरकारें, प्रधान या जिला प्रमुख हैं। केंद्र सरकार वहां फंड रोकने का काम करेगी। गारंटी का अभाव: नए एक्ट में रोजगार की गारंटी को लेकर कोई ठोस कानूनी प्रावधान नहीं छोड़ा गया है, जिससे मजदूरों का हक असुरक्षित हो गया है। प्रतीकात्मक विरोध: औजारों के साथ जताया रोष प्रदर्शन के दौरान अनोखा नजारा देखने को मिला जब कार्यकर्ता अपने साथ खुदाई में इस्तेमाल होने वाले औजार (कस्सी, परात, गेती) लेकर आए। कांग्रेस नेताओं का कहना था कि ये औजार मजदूरों के सम्मान के प्रतीक हैं और सरकार इनके हक पर डाका डाल रही है। प्रदर्शन के अंत में राष्ट्रपति के नाम जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें नए कानून को वापस लेने और मनरेगा को पुराने स्वरूप में ही प्रभावी रखने की मांग की गई। मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि गांवों की लाइफलाइन है। इसे खत्म करने का मतलब है गरीबों के पेट पर लात मारना।” — रीटा चौधरी, जिलाध्यक्ष व विधायक
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