Workshop on mustard crop organised in Deeg Rajasthan | डीग में सरसों फसल पर कार्यशाला आयोजित: संयुक्त निदेशक ने की उत्पादकता, गुणवत्ता की तकनीकी समीक्षा – Deeg News
डीग में ‘एक जिला-एक उपज’ और ‘पंच गौरव’ अभियान के तहत कृषि तकनीकी कार्यशाला का आयोजन हुआ।
डीग में राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘एक जिला-एक उपज’ और ‘पंच गौरव’ अभियान के तहत कृषि विभाग ने एक दिवसीय ब्लॉक स्तरीय तकनीकी कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य जिले की प्रमुख फसल सरसों की उत्पादकता, गुणवत्ता संवर्धन और किसानों क
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कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक रामकुंवर जाट ने कार्यशाला की अध्यक्षता की। उन्होंने विभागीय आंकड़ों और आगामी कार्ययोजना पर विस्तार से प्रकाश डाला।
संयुक्त निदेशक ने जिले के कृषि परिदृश्य की जानकारी देते हुए बताया कि पूर्वी राजस्थान में डीग जिला सरसों उत्पादन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उन्होंने तकनीकी सत्र के दौरान बताया कि जिले की कृषि योग्य भूमि के लगभग 85 प्रतिशत भाग पर रबी सत्र में प्रमुखता से सरसों की खेती की जाती है।
चालू रबी सत्र के आंकड़ों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि विभागीय प्रयासों और कृषकों की जागरूकता के फलस्वरूप इस वर्ष जिले में 1 लाख 10 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में सरसों की बुवाई संपन्न हुई है, जो जिले के फसल चक्र में सरसों की प्रधानता को दर्शाता है।

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि डीग जिले की मिट्टी और जलवायु सरसों के लिए अनुकूल है।
कार्यशाला में फसल की गुणवत्ता पर गंभीर चर्चा हुई। कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि डीग जिले की मिट्टी और जलवायु सरसों के लिए अनुकूल है, जिसके परिणामस्वरूप यहां सरसों की औसत उत्पादकता 1900 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर आंकी गई है। लैब परीक्षणों के अनुसार, यहाँ उत्पादित सरसों में तेल की मात्रा 39 से 41 प्रतिशत तक पाई जाती है, जो इसे औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।
आर्थिक सुदृढ़ीकरण और आत्मनिर्भरता
रामकुंवर जाट ने कार्यशाला में उपस्थित 100 से अधिक किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि सरसों डीग जिले की प्रमुख नकदी फसल है। इससे न केवल स्थानीय किसान आर्थिक रूप से समृद्ध हो रहे हैं, बल्कि जिला राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर होने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे पारंपरिक खेती के साथ-साथ वैज्ञानिक पद्धतियों का समावेश करें ताकि उत्पादन लागत कम हो और मुनाफा बढ़े।
तकनीकी सत्र और संवाद
कार्यशाला के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को पाला, माहू और अन्य कीट-रोगों से बचाव के उपायों की जानकारी दी। साथ ही, मिट्टी की जांच और संतुलित उर्वरक प्रयोग पर भी बल दिया गया।
ये रहे मौजूद
कार्यक्रम में कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, सहायक निदेशक, कृषि पर्यवेक्षक और विभिन्न ग्राम पंचायतों से आए प्रगतिशील किसान मौजूद रहे।

