Jalore Farmer Prem Prakash Quinoa Success Story | From Farming to International Export | फसल नहीं बिकी तो शुरू किया बिजनेस, सालाना 25-लाख कमाई: 15 देशों में एक्सपोर्ट कर रहे किनोवा, किसानों को भी मिल रहा मुनाफा – Jalore News


सरकार से मिले बीज बोझ बन गए। मंडी में व्यापारियों ने फसल खरीदने से मना कर दिया तो जालोर के किसान ने किनोवा का इंटरनेशनल मार्केट खड़ा कर दिया। आज वे किसानों को फसल से पहले एग्रीमेंट कर फिक्स और गारंटेड मुनाफा दे रहे हैं।

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किस्मत बदलने की जिद खुद के खेत से शुरू हुई। इंटरनेट को गुरु बनाया, रिसर्च और देश-विदेश का टूर कर आइडिया निकाला। खेत में ही प्रोसेस यूनिट लगाई। 10 साल में 8वीं पास किसान ने किनोवा का बिजनेस मॉडल बना दिया।

आज भारत समेत 15 देशों में एक्सपोर्ट किया जा रहा है। बिजनेस से सालाना 20 करोड़ से ज्यादा का टर्नओवर है, वहीं 25 लाख रुपए तक कमाई हो रही है।

खेती-किसानी में आज कहानी जालोर से युवा किसान प्रेम प्रकाश की…

किसान प्रेम प्रकाश ने बताया- जालोर में तीन तरह का किनोवा तैयार किया जाता है।

किसान प्रेम प्रकाश ने बताया- जालोर में तीन तरह का किनोवा तैयार किया जाता है।

8वीं पास किसान ने बनाया ग्लोबल बिजनेस मॉडल सायला उपखंड में बावतरा गांव के रहने वाले युवा किसान प्रेम प्रकाश राजपुरोहित (38) ने पढ़ाई सिर्फ 8वीं तक की है। लेकिन सोच और हौसले ने उन्हें कारोबारी बना दिया।

प्रेम प्रकाश ने बताया- साल 2014 में सरकारी योजना के तहत किनोवा की फसल को बढ़ावा देने के लिए किसानों को फ्री में बीज बांटे गए थे। वितरण कृषि केंद्र के माध्यम से किया गया था। मैंने पहली बार किनोवा के बारे में सुना था।

कृषि केंद्र द्वारा लगातार किसानों को मोटिवेट किया जा रहा था। मैंने भी बड़ी उम्मीद से 30 बीघा में 50 किलो बीज बोया था। तब अंदाजा नहीं था कि यह प्रयोग आगे चलकर करोड़ों का कारोबार बनेगा।

किनोवा की फसल चार महीने में पक कर तैयार हो जाती है। दो-तीन सिंचाई से ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है। खारे पानी में किनोवा की अच्छी पैदावार होती है।

किनोवा की फसल चार महीने में पक कर तैयार हो जाती है। दो-तीन सिंचाई से ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है। खारे पानी में किनोवा की अच्छी पैदावार होती है।

पहली फसल नहीं बेच पाए, यहीं से शुरू हुआ संघर्ष प्रेम प्रकाश ने बताया- सर्दी के सीजन में की गई खेती से फरवरी तक करीब 110 टन फसल तैयार हो गई। लेकिन इसे खरीदने वाला कोई नहीं मिला। सरकार ने भी खरीदने से मना कर दिया था।

किसानों के विरोध करने पर सरकार ने करीब 550 टन फसल खरीद ली, लेकिन सरकार भी इसे आगे बेच नहीं पाई। फसलों के खराब होने के साथ ही मेहनत की मिट्‌टी होती नजर आ रही थी।

लागत भी नहीं निकल रही थी। आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। इस समस्या से बाहर निकलने के लिए प्रेम प्रकाश ने इंटरनेट पर रिसर्च शुरू की।

कई जगह जाकर जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने अपने खेत में ही छोटी-सी जगह पर 6 लाख रुपए की लागत से प्रोसेसिंग यूनिट बनाई। इंटरनेट के माध्यम से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार किया और कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से संपर्क किया। विदेशों में किनोवा की बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने अन्य किसानों को भी प्रेरित किया, उन्हें विश्वास में लिया और उनसे एग्रीमेंट किया।

किनोवा को मशीन से प्रोसेस कर खेतों से सीधे यूनिट में पहुंचाया जाता है।

किनोवा को मशीन से प्रोसेस कर खेतों से सीधे यूनिट में पहुंचाया जाता है।

एक साल की मेहनत के बाद लगाई प्रोसेस यूनिट प्रेम प्रकाश ने बताया- कई देशों में घूमकर मशीनें खोजी और यूनिट लगाई। साल 2015 में 100 टन से शुरुआत हुई। आज हर साल 3000 से 3500 टन से अधिक फसल का निर्यात किया जा रहा है। सालाना करीब 20 करोड़ रुपए से अधिक का टर्नओवर है और 25 से 30 लाख रुपए तक का मुनाफा होता है।

किनोवा को धोकर सुखाने के बाद अलग-अलग क्वालिटी से तैयार कर स्टोर किया जाता है।

किनोवा को धोकर सुखाने के बाद अलग-अलग क्वालिटी से तैयार कर स्टोर किया जाता है।

किसानों से एग्रीमेंट कर खरीद रहे फसल यूनिट में 50 से ज्यादा स्थायी मजदूर और किसान काम करते हैं। इसके अलावा 1500 से 1700 किसान इस यूनिट से जुड़े हुए हैं। किसानों को बीज देकर एग्रीमेंट के तहत उनकी फसल खरीदी जाती है। वर्तमान में खेत में करीब 3 करोड़ रुपए की प्रोसेसिंग यूनिट लगी हुई है।

किसानों को मिल रहा 70 रुपए प्रति किलो भाव जालोर के कई गांवों में किसान किनोवा की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। सायला के बावतरा, जीवाणा समेत कई गांवों में बड़े स्तर पर किनोवा की खेती की जा रही है। इस फसल में यूरिया का उपयोग भी बहुत कम होता है। किसानों से 60-70 रुपए प्रति किलो के भाव से फसल खरीदी जाती है।

डिमांड के अनुसार किनोवा की पैकिंग कर एक्सपोर्ट किया जाता है।

डिमांड के अनुसार किनोवा की पैकिंग कर एक्सपोर्ट किया जाता है।

एक्सपोर्ट के साथ अच्छे बीज भी तैयार कर रहे यूनिट में प्रोसेसिंग के बाद 100 किलो में से करीब 70 किलो माल एक्सपोर्ट लायक तैयार हो जाता है। सभी खर्च निकालने के बाद इसे 80 से 82 रुपए प्रति किलो के भाव से निर्यात किया जाता है। वहीं अच्छी फसल और अच्छे पौधों से दोबारा बीज भी तैयार किए जाते हैं।

चार महीने में पक कर तैयार हो जाती है फसल किनोवा की फसल अक्टूबर से नवंबर में बोई जाती है। 100 से 120 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके बाद किसान फसल काटकर यूनिट में पहुंचाते हैं, जहां इसे धोकर करीब एक दिन तक सुखाया जाता है। फिर मशीनों से अलग-अलग दो क्वालिटी में तैयार किया जाता है। एक्सपोर्ट के लिए प्रतिदिन करीब 15 से 20 टन किनोवा तैयार किया जाता है, जिसके बाद पैकिंग की जाती है।

भारत में प्रचलन कम, 90% किनोवा एक्सपोर्ट भारत को छोड़कर 15 से ज्यादा देशों में इसकी भारी मांग है। भारत में प्रचलन कम है। 90 प्रतिशत किनोवा एक्सपोर्ट होता है। हालांकि अब भारत में भी इसकी मांग बढ़ रही है। मुंबई, राजस्थान और गुजरात समेत कई राज्यों में इसकी सप्लाई की जाती है। यह डी मार्ट, इंडिया गेट और पतंजलि जैसी कई ब्रांड की कंपनियों को भी जाता है, जहां जालोर का ही किनोवा उपयोग किया जाता है।

राजस्थान और मुंबई समेत अन्य जगहों पर किसान खुद भी एक्सपोर्ट करता है। यूएस, रूस और यूके समेत गुजरात की कई कंपनियां जालोर से किनोवा खरीदकर इसे 12 से 15 देशों में निर्यात करती हैं।

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