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सेम सेक्स मैरिज की सुनवाई से हटे जस्टिस संजीव खन्ना:सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली; 52 रिव्यू पिटीशन पर नई बेंच करेगी फैसला

सेम सेक्स मैरिज यानी समलैंगिक विवाह पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हो सकी। दरअसल सुनवाई से ठीक पहले जस्टिस संजीव खन्ना ने खुद को बेंच से अलग कर लिया। सूत्रों के मुताबिक, जस्टिस खन्ना ने इसके पीछे निजी कारणों का हवाला दिया है। जस्टिस खन्ना के अलग होने से रिव्यू पिटीशंस पर विचार करने के लिए चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा पांच जजों की नई बेंच का पुनर्गठन करना जरूरी हो जाएगा। इसके बाद ही इन पर सुनवाई हो सकेगी। सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने पिछले साल 17 अक्टूबर को सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट में 52 याचिकाएं दायर कर फैसले पर पुर्नविचार करने की मांग रखी गई है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस पी एस नरसिम्हा की पांच जजों की बेंच फैसले की समीक्षा की मांग करने वाली याचिकाओं पर चैंबर में सुनवाई करने वाली थी। इससे पहले 9 जुलाई को सीनियर एडवोकेट अभिषेक सिंघवी और एनके कौल ने CJI डीवाई चंद्रचूड़ से रिव्यू पिटिशन पर ओपन कोर्ट में सुनवाई की मांग की। इससे CJI ने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा- परंपरा के मुताबिक पुनर्विचार याचिका पर चेंबर में फैसला किया जाता है। CJI ने कहा था- संसद कानून बना सकता है 17 अक्टूबर को 5 जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि कोर्ट स्पेशल मैरिज एक्ट में बदलाव नहीं कर सकता। कोर्ट सिर्फ कानून की व्याख्या कर उसे लागू करा सकता है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट के प्रावधानों में बदलाव की जरूरत है या नहीं, यह तय करना संसद का काम है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस रविंद्र भट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी। जस्टिस हिमा कोहली को छोड़कर फैसला चीफ जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस कौल, जस्टिस भट और जस्टिस नरसिम्हा ने बारी-बारी से फैसला सुनाया था। CJI ने सबसे पहले कहा कि इस मामले में 4 जजमेंट हैं। एक जजमेंट मेरी तरफ से है, एक जस्टिस कौल, एक जस्टिस भट और जस्टिस नरसिम्हा की तरफ से है। इसमें से एक डिग्री सहमति की है और एक डिग्री असहमति की है कि हमें किस हद तक जाना होगा। कोर्ट रूम LIVE: ‘होमोसेक्शुअलिटी सिर्फ अर्बन एरिया तक सीमित नहीं’
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘होमोसेक्शुअलिटी या क्वीरनेस सिर्फ अर्बन इलीट क्लास तक सीमित नहीं है। ये सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाले और अच्छी जॉब करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में खेती करने वाली महिलाएं भी क्वीर हो सकती हैं। ऐसा सोचना कि क्वीर लोग सिर्फ अर्बन या इलीट क्लासेस में ही होते हैं, ये बाकियों को मिटाने जैसा है।’ ‘शहरों में रहने वाले सभी लोगों को क्वीर नहीं कहा जा सकता है। क्वीरनेस किसी की जाति या क्लास या सोशल-इकोनॉमिक स्टेटस पर निर्भर नहीं करता। ये कहना भी गलत है कि शादी एक स्थायी और कभी न बदलने वाला संस्थान है। विधानपालिका कई एक्ट्स के जरिए विवाह के कानून में कई सुधार ला चुकी है।’ CJI चंद्रचूड़ ने कहा- हर व्यक्ति को अपने पार्टनर को चुनने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा- समलैंगिक लोगों के अधिकार के लिए एक कमेटी बनाए
केंद्र सरकार समलैंगिक लोगों के अधिकार के लिए एक कमेटी बनाए। यह कमेटी राशन कार्ड में समलैंगिक जोड़ों को परिवार के रूप में शामिल करने, समलैंगिक जोड़ों को संयुक्त बैंक खातों के लिए नामांकन करने, पेंशन, ग्रेच्युटी आदि पर विचार करेगी। समिति की रिपोर्ट को केंद्र सरकार के स्तर पर देखा जाएगा। फैसला सुरक्षित रखे जाने से पहले 6 दिन की सुनवाई में क्या दलीलें और टिप्पणियां आईं सिलसिलेवार पढ़ें… 27 अप्रैल, छठे दिन की सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था- सरकार इस मामले में क्या इरादा रखती है सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था, ‘अगर ज्यूडीशियरी इसमें एंट्री करती है तो यह एक कानूनी मुद्दा बन जाएगा। सरकार बताए कि वह इस संबंध में क्या करने का इरादा रखती है और कैसे वह ऐसे लोगों की सुरक्षा और कल्याण के काम कर रही है। समलैंगिकों को समाज से बहिष्कृत नहीं किया जा सकता है।’ केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था, ‘स्पेशल मैरिज एक्ट केवल अपोजिट जेंडर वालों के लिए है। अलग आस्थाओं वालों के लिए इसे लाया गया। सरकार बाध्य नहीं है कि हर निजी रिश्ते को मान्यता दे। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि नए मकसद के साथ नई क्लास बना दी जाए। इसकी कभी कल्पना नहीं की गई थी।’ 26 अप्रैल, सुनवाई का पांचवां दिन: केंद्र ने कहा था- नई परिभाषा के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
केंद्र सरकार की ओर से तुषार मेहता ने कहा- कोर्ट एक ही कानून के तहत अलग श्रेणी के लोगों के लिए अलग नजरिया नहीं रख सकता। हमें नई परिभाषा के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि LGBTQIA+ में ‘प्लस’ के क्या मायने हैं, ये नहीं बताया गया है। उन्होंने पूछा, इस प्लस में लोगों के कम से कम 72 शेड्स और कैटेगरी हैं। अगर ये कोर्ट गैर-परिभाषित श्रेणियों को मान्यता देता है तो फैसले का असर 160 कानूनों पर होगा, हम इसे कैसे सुचारु बनाएंगे? मेहता ने आगे कहा कि कुछ लोग ऐसे हैं जो किसी भी लिंग के तहत पहचाने जाने से इनकार करते हैं। उन्होंने कहा, कानून उनकी पहचान किस तरह करेगा? पुरुष या महिला के तौर पर? एक कैटेगरी ऐसी है, जो कहती है कि लिंग मूड स्विंग (मन बदलने) पर निर्भर करता है। ऐसी स्थिति में उनका लिंग क्या होगा, कोई नहीं जानता। मेहता ने कहा कि असल सवाल ये है कि इस मामले में ये कौन तय करेगा कि एक वैध शादी क्या और किसके बीच है। मेहता ने दलील दी कि क्या ये मामला पहले संसद या राज्यों की विधानसभाओं में नहीं जाना चाहिए। 25 अप्रैल, सुनवाई का चौथा दिन: CJI बोले- याचिकाकर्ताओं के मुद्दों पर हस्तक्षेप का अधिकार संसद को
सुनवाई के चौथे दिन CJI चंद्रचूड़ ने कहा, ‘इसमें कोई शक नहीं कि इन याचिकाओं में जो मुद्दे उठाए गए हैं, उनमें हस्तक्षेप का अधिकार संसद के पास है। इसलिए सवाल ये है कि इस मामले में कोर्ट कितना आगे तक जा सकती है।’ स्पेशल मैरेज एक्ट के तहत अधिकार देने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘अगर हम स्पेशल मैरेज एक्ट के तहत इसे देखेंगे, हमें कई पर्सनल लॉ बोर्ड में भी सुधार करने होंगे।’ जस्टिस कौल और जस्टिस भट्ट ने कहा कि इसलिए बेहतर होगा कि वो इस बात पर गौर करें कि समलैंगिक विवाह का अधिकार दिया जा सकता है या नहीं। इसके बहुत अंदर जाने पर मामला उलझ जाएगा। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि संविधान में दिए गए अधिकार से वंचित करने के लिए संसद का कारण नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा कि जब किसी समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन हो तो उन्हें संविधान के आर्टिकिल 32 के आधार पर संवैधानिक पीठ में जाने का अधिकार है। उन्होंने कोर्ट से ये भी कहा कि याचिकाकर्ता कोई विशेष बर्ताव की अपेक्षा नहीं कर रहे हैं बल्कि वो स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत अपने संबंधों की व्यावहारिक व्याख्या चाहते हैं। 20 अप्रैल, तीसरे दिन की सुनवाई; CJI ने पूछा- क्या शादी के लिए 2 अलग जेंडर वाले पार्टनर्स होना जरूरी
सुनवाई के तीसरे दिन कोर्ट में बच्चे को गोद लेने पर बहस हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील विश्वनाथन ने कहा कि LGBTQ माता-पिता बच्चों को पालने के लिए उतने ही योग्य हैं जितने अपॉजिट सेक्स के माता-पिता। बेंच इस दलील से सहमत नहीं था कि अपोजिट सेक्स के विपरीत समलैंगिक जोड़े अपने बच्चों की उचित देखभाल नहीं कर सकते। बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोग अब इस धारणा से दूर हो रहे हैं कि एक लड़का होना ही चाहिए। CJI ने कहा- समलैंगिक संबंध सिर्फ शारीरिक संबंध नहीं है बल्कि एक स्थिर, भावनात्मक संबंध से कुछ अधिक बढ़कर हैं। 19 अप्रैल, सुनवाई का दूसरा दिन: केंद्र सरकार ने कहा- राज्यों को भी इस बहस में शामिल किया जाए
सुनवाई के दूसरे दिन केंद्र सरकार ने अपील की कि इस मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पार्टी बनाया जाए। याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि एडॉप्शन, सरोगेसी, अंतरराज्यीय उत्तराधिकार, कर छूट, कर कटौती, अनुकंपा सरकारी नियुक्तियां आदि का लाभ उठाने के लिए विवाह की आवश्यकता होती है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि वे इसे शहरी एलीट क्लास का विचार नहीं कह सकती। खासतौर पर तब, जब सरकार ने इस दावे के पक्ष में कोई डेटा नहीं दिया है। CJI चंद्रचूड़ ने कहा, ‘ये शहरी सोच लग सकती है क्योंकि शहरी इलाकों में अब लोग खुलकर सामने आने लगे हैं।’ 18 अप्रैल, सुनवाई का पहला दिन: सेम सेक्स मैरिज की याचिकाएं एलीट क्लास के लोगों का विचार
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के पहले दिन कहा कि वो पर्सनल लॉ के क्षेत्र में जाए बिना देखेगी कि क्या साल 1954 के स्पेशल मैरिज एक्ट के जरिए सेम सेक्स कपल को अधिकार दिए जा सकते हैं। केंद्र सरकार की ओर से सोलिसिटर जनरल ने कहा था कि ये याचिकाएं एलीट क्लास के लोगों के विचारों को दर्शाती हैं। केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि कानूनी तौर पर देखा जाए तो शादी एक बायोलॉजिकल पुरुष और बायोलॉजिकल महिला के बीच का रिश्ता होता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिला और पुरुष में भेद करने की कोई पुख्ता अवधारणा नहीं है।

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