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भारतवंशी ऋषि सुनक हारे:रिची-रिच वाली लाइफ स्टाइल, किंग चार्ल्स से अमीर इंडियन वाइफ; किन 5 वजहों से गंवाई सत्ता

तारीख 25 अक्टूबर 2022, ऋषि सुनक 10 डाउनिंग स्ट्रीट यानी ब्रिटेन के प्रधानमंत्री आवास में पत्नी और कुत्ते के साथ पहला कदम रखते हैं। उन्हें पार्टी की अंतर्कलह की वजह से प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली थी। ठीक 620 दिन बाद 5 जून 2024 को सुनक लंदन की उसी 10 डाउनिंग स्ट्रीट से अपने परिवार के साथ बाहर आकर अपनी हार कबूल करेंगे। उनकी कंजर्वेटिव पार्टी को 14 साल बाद चुनाव में हार मिली है। इसकी वजह पार्टी की उसी अंतर्कलह को बताया जा रहा है जो उन्हें सत्ता में लाई थी। चुनाव से पहले ही सरकार में इस्तीफों की झड़ी लग गई थी। साल भर में 3 मंत्रियों और 78 सांसदों ने इस्तीफा देकर चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। लगातार 14 साल से सत्ता में रही कंजर्वेटिव पार्टी की हालत ऐसी कैसे हुई, सुनक ने PM रहते क्या गलतियां कीं जो पार्टी को इतनी करारी हार झेलनी पड़ी। स्टोरी में सुनक की हार की 5 बड़ी वजह जानिए… पहली वजह- सुनक की लग्जरी लाइफ
जुलाई 2023 में सुनक स्कॉटलैंड के दौरे से लौटकर BBC रेडियो को इंटरव्यू दे रहे थे। तभी प्रेजेंटर ने उनसे एक सवाल पूछा- आप हमेशा क्लाइमेट चेंज रोकने की बातें करते हैं। दूसरी तरफ, देश के अंदर यात्रा के लिए भी प्राइवेट जेट का इस्तेमाल करते हैं। इससे भी तो कार्बन इमिशन यानी कार्बन उत्सर्जन होता है। इस सवाल पर सुनक नाराज हो गए। उन्होंने कहा- मैं अपने वक्त का सबसे सही इस्तेमाल करना चाहता हूं। अच्छा होगा आप इस मसले पर सवाल करने से ज्यादा, इसके हल पर बात करें। ये पहली बार नहीं था जब सुनक के महंगी लाइफ स्टाइल पर सवाल उठे हों। उनके वित्त मंत्री रहते हुए भी वे कई बार अपनी महंगी लाइफस्टाइल को लेकर आलोचनाओं का शिकार हुए थे। 2020 में वे 20 हजार रुपए के कॉफी मग के साथ स्पॉट हुए थे। सुनक ने 2022 में एक हफ्ते के भीतर प्राइवेट जेट से ट्रैवल के लिए 5 करोड़ रुपए से ज्यादा सरकारी पैसा खर्च किया था। इसके चलते विपक्ष उन पर टैक्सपेयर्स के पैसों की बर्बादी का आरोप लगाता रहा है। विपक्ष कई मौकों पर इस मुद्दे को उठाता रहा है कि ब्रिटेन की जनता महंगाई की मार झेल रही है और ऋषि सुनक आम जनता के पैसों पर लग्जरी लाइफ जी रहे हैं। वहीं, सुनक की पत्नी को ब्रिटेन की बिल गेट्स कहा जाता है। ऋषि सुनक की पत्नी अक्षता मूर्ति ब्रिटेन की सबसे अमीर महिला हैं। संडे टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2023 में सुनक और अक्षता की संपत्ति में 1200 करोड़ रुपए का इजाफा हुआ। उनकी कुल संपत्ति बढ़कर 68 हजार करोड़ रुपए हो गई। सुनक और अक्षता ब्रिटेन के महाराजा से भी अमीर हैं। अक्षता मूर्ति IT कंपनी इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की बेटी हैं। अक्षता के पास इंफोसिस में 0.91 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इसकी कीमत लगभग 4.5 हजार करोड़ रुपए है। लेबर पार्टी ने सुनक और उनकी पत्नी की संपत्ति में हुए इजाफे को चुनाव में अहम मुद्दा बनाया। अक्षता मूर्ति पर लेबर पार्टी टैक्स चोरी का आरोप भी लगाती रही है। सुनक के प्रधानमंत्री बनने के दौरान भी उन पर ये आरोप लगा था। दरअसल, अक्षता मूर्ति ने ऋषि सुनक से शादी के बाद भी भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी है। इसके चलते उन्हें ब्रिटेन के बाहर होने वाली कमाई पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता है। इस मुद्दे को लेकर सुनक की पार्टी के अंदर भी सवाल उठते रहे हैं। पिछले साल अक्षता मूर्ति की संपत्ति और टैक्स में चोरी का मुद्दा ब्रिटिश संसद में उठा था। इसके बाद सुनक को इससे जुड़े सवालों का संसद में जवाब देना पड़ा था। इस मुद्दे के संसद में उठने के बाद IT कंपनी इंफोसिस के शेयरों में 10 प्रतिशत की भारी गिरावट देखने को मिली थी। इसके चलते अक्षता मूर्ति को एक दिन में करीब 500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। द गार्जियन के मुताबिक सुनक की रोजमर्रा की जिंदगी में लोगों को उनकी अमीरी की झलक दिखती रही। इससे लोगों के मन में ये संशय बना रहा कि सुनक उनकी परेशानियों को समझ नहीं पाए। जो उनकी हार में बड़ी वजह बनी। दूसरी वजह- अर्थव्यवस्था बनी गले की फांस
ब्रिटेन में 70 साल के इतिहास में टैक्स की दरें सबसे ज्यादा हैं। सरकार के पास लोगों पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं। पर ये नौबत आई कैसे? ये जानने के लिए 4 साल पीछे जाते हैं… साल 2020… दुनिया कोरोना के जाल में फंसी थी। ब्रिटेन की सरकार इससे बच निकलने के लिए योजना बनाती है। इकोनॉमी को पटरी पर लाने के लिए 280 बिलियन पाउंड यानी 29 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है। उस वक्त सुनक प्रधानमंत्री नहीं, वित्त मंत्री थे। पूरी योजना उन्हीं की बनाई हुई थी। हालांकि, सरकार ने ये पैसे अपनी जेब से नहीं दिए थे। इसके लिए कर्ज लिया गया था। इसके पीछे सोच ये थी कि कर्ज बहुत कम 0.1% ब्याज दर पर लिया है, इकोनॉमी के पटरी पर आते ही उसे चुका देंगे। फिर वो हुआ जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी… रूस ने यूक्रेन पर चढ़ाई कर दी…
बदले में अमेरिका की अगुआई में यूरोप के देशों ने रूस से तेल और गैस खरीदना बंद कर दिया। नतीजा यह हुआ कि वहां, गैस और तेल के दाम आसमान छूने लगे। महंगाई दर बढ़कर 5% से ज्यादा हो गई। लोगों के लिए जरूरत का सामान खरीदना मुश्किल होने लगा। सरकार ने इस एनर्जी संकट से निपटने के लिए फिर उधार लेकर 400 बिलियन पाउंड खर्च कर दिए। बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए ब्रिटेन के सेंट्रल बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। इससे महंगाई तो कम हुई पर ब्रिटेन की सरकार ने जो कर्ज लिया था उसका ब्याज बढ़ गया। ब्याज दरें 5% से ज्यादा हो गईं। सुनक की सरकार कर्ज पर सालाना 40 बिलियन पाउंड चुका रही थी वो बढ़कर 100 बिलियन पाउंड हो गया। ब्याज दरें बढ़ने की वजह से सरकार के पास लोगों की जरूरतों, देश की सुरक्षा, हेल्थ सिस्टम पर खर्च करने के लिए पैसा कम पड़ने लगा। इससे सुनक सरकार ने लोगों पर खर्च कम कर दिया। जिससे जनता में नाराजगी बढ़ी। इस चुनाव में सबसे अहम मुद्दा ही इकोनॉमी है। तीसरी वजह- पार्टी की अंदरूनी कलह, 5 साल में 4 प्रधानमंत्री बने
23 जून 2016 को ब्रिटेन में एक जनमत संग्रह हुआ। इसमें 52% लोगों ने ब्रेग्जिट का समर्थन और 48% ने विरोध किया था। समर्थन करने वालों का मानना था कि ब्रिटेन के EU का मेंबर होने की वजह से उनके देश में बाहरी लोगों (प्रवासियों) की तादाद बढ़ रही है। बाहरी उनकी नौकरियां खा रहे हैं। ब्रेग्जिट पर आए फैसले के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ दिया था। ब्रेग्जिट को लेकर उनकी सोच पार्टी लाइन से अलग थी। कंजर्वेटिव पार्टी में ज्यादातर नेता ब्रेग्जिट चाहते थे। 31 जनवरी 2020 को ब्रिटेन की घड़ी में रात के 12 बजने के साथ ही ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन (EU) से अलग हो गया। कंजर्वेटिव पार्टी की थेरेसा मे ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनीं। उन्हें ब्रेग्जिट को इस तरह लागू करवाना था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था कमजोर न पड़े। दरअसल, EU का मेंबर होने के चलते ब्रिटेन को यूरोप के देशों के साथ व्यापार में कई तरह की छूट मिलती थी। यह ब्रेग्जिट के बाद खत्म होने वाली थी, लेकिन ब्रेग्जिट की शर्तों पर थेरेसा मे को विपक्ष तो दूर खुद अपनी पार्टी से समर्थन नहीं मिला। पार्टी गुटों में बंट गई और थेरेसा मे को इस्तीफा देना पड़ा। बोरिस जॉनसन को मिली कमान
थेरेसा मे के बाद ब्रिटेन की बागडोर बोरिस जॉनसन के पास आई। इन्होंने ब्रेग्जिट के दौरान प्रवासियों के खिलाफ खूब बयानबाजी की थी। हालांकि बोरिस भी ज्यादा वक्त तक सत्ता में नहीं टिक पाए। वे एक के बाद एक स्कैंडल में घिरने लगे। 2020 में जब दुनिया और ब्रिटेन के लोग लॉकडाउन के चलते अपने घरों में कैद थे, तब बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री कार्यालय में पार्टी कर रहे थे। ये पार्टी बोरिस के 56वें जन्मदिन पर उनकी पत्नी ने रखी थी। इसमें ऋषि सुनक और जॉनसन गुट के कई कंजर्वेटिव नेता मौजूद थे। जब यह मामला संसद में उठा तो जॉनसन ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बाद उन पर 4 बार संसद को गुमराह करने का आरोप लगा। इसके अलावा बोरिस जॉनसन पर यौन शोषण के आरोपी को डिप्टी चीफ व्हिप बनाने का भी आरोप लगा। बोरिस ने अपने बचाव में कहा कि वे आरोपों के बारे में नहीं जानते थे। हालांकि वे झूठे साबित हुए। बोरिस जॉनसन पर क्वीन एलिजाबेथ के पति प्रिंस फिलिप के फ्यूनरल से पहले भी एक शराब पार्टी करने का आरोप लगा। इसका खुलासा होने के बाद उनकी पार्टी के बड़े नेताओं ने उनसे दूरी बना ली। पार्टी में फूट बढ़ने लगी। उन्हें 2022 में इस्तीफा देना पड़ा। लिज ट्रस के U टर्न ने भारतवंशी को बनाया PM
बोरिस जॉनसन के बाद ब्रिटेन की कमान लिज ट्रस को मिली। इस वक्त तक ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच चुकी थी। ट्रस ने वादा किया था कि वे बिना टैक्स बढ़ाए उसे पटरी पर ले आएंगी। पर ऐसा नहीं हुआ उन्होंने मिनी बजट लॉन्च कर टैक्स बढ़ा दिया। इससे ब्रिटेन की इकोनॉमी क्रैश होने लगी। कड़ी आलोचना के बाद उन्हें अपने मिनी बजट पर यू-टर्न लेना पड़ा। प्रधानमंत्री रहने के 44 दिनों में ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। लिज ट्रस के इस्तीफे के बाद ऋषि सुनक ने प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली। हालांकि ऋषि सुनक पार्टी नेताओं की पहली पसंद कभी नहीं थे। उनकी नीतियों को लेकर पार्टी के अंदर कई मौकों पर सवाल उठे हैं। सुनक के 3 मंत्रियों ने उनकी नीतियों पर सवाल उठाते हुए इस्तीफा दे दिया था। पार्टी में फूट खुलकर सामने आने के बाद उन्होंने 6 महीने पहले ही चुनाव की घोषणा कर दी। चौथी वजह- एंटी इनकम्बेंसी की मार
प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी पिछले 14 साल से सत्ता में बनी हुई है। पार्टी ने पिछले 14 सालों में अब तक 5 प्रधानमंत्री बनाए हैं। साल 2010 में डेविड कैमरन कंजर्वेटिव पार्टी से प्रधानमंत्री के तौर पर जीते थे। इसके बाद साल 2015 में उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी ने दूसरी जीत हासिल की थी। थेरेसा मे ने 7 जून 2019 को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया, 6 सितंबर 2022 को बोरिस जॉनसन ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया। कोई भी 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। बार-बार प्रधानमंत्रियों के बदले जाने से भी जनता के बीच कंजर्वेटिव पार्टी को लेकर विश्वास में कमी आई। जनता में कंजर्वेटिव पार्टी के प्रति अविश्वास पैदा हो गया। जिससे लोगों के बीच सत्ता विरोधी लहर बनी। पांचवी वजह- सुनक के वोट काटने वाले नाइजल फराज
नवंबर 2018 में ब्रिटेन की राजनीति में एक नई ‘रिफॉर्म यूके’ पार्टी की एंट्री हुई । इस पार्टी के कर्ताधर्ता कट्टरपंथी नेता नाइजल फराज हैं। उन्होंने ब्रेग्जिट के दौरान खूब सुर्खियां बटोरी थीं। ब्रेग्जिट भले ही सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी करा रही थी, पर उसकी सारी कमान नाइजल फराज के पास थी। उनका पूरा कैंपेन यूरोपियन यूनियन से बाहर आने के समर्थन में था। कंजर्वेटिव और रिफॉर्म UK दोनों ही पार्टी की नीतियां लगभग एक जैसी हैं। नाइजल फराज की बढ़ती लोकप्रियता सुनक के लिए बड़ा सिरदर्द बन गई। सुनक ने उन्हीं की लोकप्रियता के डर से समय से 6 महीने पहले चुनाव कराया। हालांकि इसके बावजूद वे रिफॉर्म UK पार्टी को वोट काटने से नहीं रोक पाए।

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