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कौन हैं सुनक को हराने वाले कीर स्टार्मर:वेश्यालय की छत पर रहकर पढ़े, वामपंथियों को ठिकाने लगाया, कश्मीर पर भारत के साथ

भारतीय मूल के ऋषि सुनक अब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे। कभी वेश्यालय की छत पर रहकर पढ़ाई करने वाले लेबर पार्टी के कीर स्टार्मर ने उन्हें चुनाव में करारी शिकस्त दी है। लेबर पार्टी को संसद की 650 में से 410 सीटें मिली हैं। स्टार्मर अब ब्रिटेन के 58वें प्रधानमंत्री बनेंगे। उनकी पर्सनालिटी सुनक से एकदम उलट है। भारतवंशी सुनक जहां खुद को धार्मिक बताते रहे हैं, वहीं स्टार्मर भगवान में यकीन नहीं करते। वे सुनक की तरह अरबपति भी नहीं हैं। कभी राजनीति छोड़कर किताब बेचने की ख्वाहिश रखने वाले स्टार्मर कौन हैं, वे भारत के बारे में क्या सोचते हैं, किस्सों में पढ़िए उनकी अब तक की जिंदगी… लाल घेरे में दिख रहा ये लड़का अब ब्रिटेन का प्रधानमंत्री होगा… नर्स का बेटा जिसे ग्रामर स्कूल का सुपरबॉय कहा जाता था
2 सितंबर 1962 की बात है। लंदन में एक मामूली नर्स और औजार बनाने वाले कारीगर के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। दुनिया आज इसे सर कीर स्टार्मर के नाम से जानती है। स्टार्मर के पिता रोडने स्टार्मर हार्डकोर लेफ्टिस्ट थे, जिसके चलते उन्होंने लेबर पार्टी के संस्थापक कीर हार्डी के नाम पर अपने बेटे का नाम कीर स्टार्मर रखा। स्टार्मर का बचपन मिडिल क्लास परिवार में बीता। वे शुरुआत से ही पढ़ाई के मामले में तेज थे। उन्होंने 11वीं तक की पढ़ाई के बाद ग्रामर स्कूल में दाखिला लिया। पढ़ाई, खेलकूद और म्यूजिक में बेहतरीन प्रदर्शन के कारण उनके भाई-बहन उन्हें ग्रामर स्कूल का सुपरबॉय कहकर बुलाते थे। स्टार्मर ने कई इंटरव्यू में बताया है कि उनके पिता के साथ उनके संबंध ठीक नहीं थे। वो बताते हैं कि उनके पिता गुस्सैल और चिड़चिड़े स्वभाव के थे। उनका भावनात्मक लगाव सिर्फ मां जोसेफिन के लिए था। वह जब 11 साल के थे तब उनकी मां को एक दुर्लभ बीमारी हो गई थी। जो कुछ-कुछ ऑर्थराइटिस जैसी थी। स्टार्मर ने पोलिटिको को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि उनकी मां की बीमारी की वजह से उनका बचपन बहुत बुरा बीता। बीमारी के चलते उनकी मां की हड्डियां धीरे-धीरे इतनी कमजोर हो गईं कि उनका खड़ा होना मुश्किल हो गया। इस वजह से वह मुश्किल से चल पाती थीं। 50 सालों तक वह दर्द से जूझती रहीं। जीवन के आखिरी दिनों में उनकी हड्डियां बिस्किट जितनी कमजोर हो गई थी जो हल्के दबाव में भी टूट जाती थीं। उनका खाना, सोना, करवट लेना सब बंद हो गया। दर्द से वह इतनी परेशान हो गईं कि उनके पैर तक काटने पड़ गए। उनका ये दर्द उनकी मौत तक रहा। पढ़ाई के दौरान ही राजनीति से जुड़े
पढ़ाई के दौरान ही महज 16 साल की उम्र में वे लेबर पार्टी के यूथ विंग ‘यंग सोशलिस्ट’ के साथ जुड़ गए। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद 18 साल की उम्र में उन्होंने लीड्स यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई के लिए एडमिशन लिया। इसके साथ ही वो अपने परिवार में यूनिवर्सिटी जाकर पढ़ने वाले पहले व्यक्ति बने। स्टार्मर मिडिल क्लास परिवार से थे। जब लीड्स यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए लंदन आए तो उनके पास ज्यादा पैसे नहीं थे। इसके चलते उन्हें वैश्यालय की छत पर बने कमरे में रहना पड़ा था। छोटा सा वह कमरा काफी गंदा था, आस-पास बहुत शोर होता था। हालांकि, इसका किराया कम होने के चलते स्टार्मर ने वहां रहना ठीक समझा। उस कमरे को स्टार्मर और उनके दोस्तों ने अपना अड्डा बना लिया था। एक दिन उनके एक दोस्त के पिता ने जब स्टार्मर को उस घर में जाते देखा तो उन्होंने इसे लेकर नाराजगी भी जाहिर की थी। स्टार्मर की बायोग्राफी के मुताबिक उस कमरे के नीचे जो महिला रहा करती थी, वो अक्सर उसे जोक भी सुनाया करते थे। वकालत ने पत्नी विक्टोरिया से मिलवाया, पहली मुलाकात में लड़े थे
1985 में लीड्स से बैचलर्स डिग्री हासिल करने के बाद स्टार्मर 1986 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी गए जहां से उन्होंने सिविल लॉ में पोस्टग्रेजुएशन पूरा किया। स्टार्मर ने 1987 में लंदन में बतौर बेरिस्टर मानवाधिकार, क्रिमिनल डिफेंस वर्क जैसे मामलों पर काम करना शुरू किया। कीर स्टार्मर ब्रिटेन में राजशाही के खिलाफ रहे हैं। इसके बावजूद कानून के जरिए लोगों की भलाई करने के लिए उन्हें राजमहल से नाइटहुड की उपाधी मिली और वे कीर स्टार्मर से सर कीर स्टार्मर हो गए। उन्हें 2002 में क्वीन के काउंसल भी बनाया गया था। वकील के तौर पर काम करने के दौरान ही स्टार्मर की मुलाकात नेशनल हेल्थ सर्विस की लीगल टीम में काम करने वाली विक्टोरिया से हुई। जो आगे चलकर उनकी पत्नी बनींं। स्टार्मर और विक्टोरिया की मुलाकात का किस्सा काफी दिलचस्प है। स्टार्मर ने टाइम्स मैग्जीन से इसे शेयर करते हुए बताया था कि उन्होंने एक केस के सिलसिले में उस कंपनी को फोन किया था जिसमें विक्टोरिया काम करती थीं। वे एक डॉक्यूमेंट को फिर से चेक करवाना चाहते थे। इत्तेफाक से उस पर विक्टोरिया ने काम किया था। स्टार्मर की इंक्वायरी पर विक्टोरिया चिढ़ गईं। उन्होंने गाली देते हुए स्टार्मर के बारे में कहा था, “ये खुद को समझता क्या है।” जब स्टार्मर को विक्टोरिया के बारे में पता चला तो उन्होंने माफी मांगी और डेट पर चलने का प्रस्ताव दे दिया। विक्टोरिया ने इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद 2002 में दोनों की शादी हुई। दोनों अपने 2 बच्चों के साथ लंदन में 18 करोड़ के घर में रहते हैं। मैकडोनाल्ड से भिड़ गए थे स्टार्मर, दो एक्टिविस्ट का 10 सालों तक लड़ा केस
कीर स्टार्मर ने साल 1987 में लंदन में बेरिस्टर के तौर पर प्रैक्टिस शुरु की। शुरुआत में उन्होंने मानवाधिकार, क्रिमिनल डिफेंस जैसे केसेज पर काम किया। 1997 में उन्होंने मैकडोनाल्ड के खिलाफ दो क्लाइमेट एक्टिविस्ट्स का केस लड़ा। क्लामेट एक्टिविस्ट हेलेन स्टील और डेविड मॉरिस ने मैकडोनाल्ड पर कई तरह के आरोप लगाए थे। वे कंपनी के खिलाफ पर्चे छपवाते थे और लोगों को बांटते थे। इस पर लिखा होता था- ‘मैकडोनाल्ड के साथ क्या गड़बड़ है? वो सब जानिए जो कंपनी आपसे छुपा रही है।’ इस पर्चे में कंपनी पर कर्मचारियों का शोषण, वनों की कटाई, जंक फूड को बढ़ावा देने जैसे कई आरोप लगाए गए थे। इसके बाद मैकडोनाल्ड ने इन दोनों एक्टिविस्ट पर मानहानि का केस कर दिया। कीर स्टार्मर ने इनका केस करीब 10 सालों तक लड़ा। हालांकि, आखिर में वे मैकडोनाल्ड के खिलाफ को ठोस सबूत पेश नहीं कर पाए। इसके बाद कोर्ट ने हेलेन और डेविड को 40 हजार पाउंड का जुर्माना लगाया, लेकिन उन्होंने जुर्माना देने से इनकार कर दिया। मैकडोनाल्ड ने कहा कि वह जुर्माना वसूलना नहीं चाहते। उसके पक्ष में फैसला आया है वह इसी से खुश हैं। हालांकि, ब्रिटिश कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ यूरोपीय मानवाधिकार ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हेलेन स्टील और डेविड मॉरिस के पास फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का अधिकार है। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से इन दोनों को 57 हजार पाउंड देने का आदेश दिया। ये केस उस दौरान काफी चर्चित हुआ था। इसे ‘मैक्लिबेल केस’ के रूप में जाना जाता है। साल 2015 में स्टार्मर को लेबर पार्टी से सांसदी का टिकट मिला। वे पहली बार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। अब 9 साल बाद वे PM पद तक पहुंच गए हैं। कभी राजनीति छोड़ किताब बेचना चाहते थे स्टार्मर
अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ मुताबिक स्टार्मर के दोस्त बताते हैं कि 2021 में हार्टलपूल के उपचुनाव में मिली हार के बाद कीर स्टार्मर राजनीति को अलविदा कहने वाले थे। वो इस चुनाव में हुई हार से बेहद दुखी थे। लेबर पार्टी के लिए सेफ सीट माने जानी वाली हार्टलपूल को कंजर्वेटिव के हाथों हारने के बाद स्टार्मर ने राजनीति छोड़ने को लेकर अपने दोस्तों से बात की थी। उन्होंने अपने दोस्तों को बताया था कि वो राजनीति छोड़कर किताबों की दुकान में काम करना चाहते थे। लेबर पार्टी से कट्टर वामपंथियों का किया सफाया, जेरेमी कॉर्बिन को टिकट तक नहीं दिया
कीर स्टार्मर साल 2020 में लेबर पार्टी के नेता प्रतिपक्ष बनाए गए। BBC के मुताबिक उन पर आरोप हैं कि उन्होंने एक-एक कर पार्टी में वामपंथी नेताओं को किनारे कर दिया। आरोप लगाने वाले नेताओं में डायने एबॉट, फैजा शाहीन और लॉयड रसेल-मोयल जैसे नाम शामिल हैं। लेबर पार्टी के कई नेताओं ने आरोप लगाया कि वामपंथ के अधिक करीब होने और गाजा युद्ध में इजराइल की आलोचना करने के कारण उन्हें टिकट नहीं दिया गया। स्टार्मर ने लेबर पार्टी के कद्दावर नेता रहे जेरेमी कॉर्बिन तक को भी टिकट नहीं दिया। कॉर्बिन पर हाल ही में यहूदी विरोधी बयान देने के आरोप लगे थे। कॉर्बिन साल 1983 से लगातार इस्लिंगटन नॉर्थ सीट पर सांसद बनते आ रहे हैं। टिकट कट जाने के बाद वे लेबर उम्मीदवार के खिलाफ अपनी पारंपरिक सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसके बाद स्टार्मर ने लेबर पार्टी से 40 साल पुराने नेता को निकाल दिया। स्टार्मर ने ऐलान किया कि अब उनके पुराने बॉस कॉर्बिन कभी पार्टी में वापस नहीं आएंगे। पोलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक स्टार्मर को अपनी विदेश नीति के कारण उन्हें अपनी ही पार्टी में आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। 7 अक्टूबर के हमले के बाद इजराइल ने गाजा में जवाबी कार्रवाई की थी। जब इसकी आलोचना हुई तो स्टार्मर ने कहा कि हमास के खात्मे तक इजराइल को जंग नहीं रोकनी चाहिए। उनके इस बयान को यहूदियों के समर्थन के रूप में देखा गया। द टाइम्स ऑफ इजराइल की रिपोर्ट के मुताबिक जेरेमी कॉर्बिन की यहूदी विरोधी नीतियों के कारण ये समुदाय लेबर पार्टी के खिलाफ हो गया था। साल के चुनाव के दौरान 2019 के चुनाव में कहा था कि अगर लेबर पार्टी जीत जाती है तो आधे यहूदी देश छोड़ देंगे। कीर स्टार्मर ने यहूदियों की नाराजगी को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश की। स्टार्मर ने कॉर्बिन की गलती सुधारी, कश्मीर पर बदला पार्टी का भारत विरोधी स्टैंड
साल 2015 में जेरेमी कॉर्बिन जब लेबर पार्टी के नेता बने, तब उन्होंने कश्मीर मुद्दे को लेकर कई ऐसे बयान दिए जिन्हें भारतवंशियों ने पसंद नहीं किया। अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने साल 2019 में कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया। तब कॉर्बिन ने एक आपातकालीन प्रस्ताव लेकर आए जिसमें कहा गया कि कश्मीर के लोगों को स्वयं फैसले लेने का अधिकार होना चाहिए। इसके बाद ब्रिटेन में रहने वाले हिंदू वोटर्स उनसे नाराज हो गए और उन्हें एंटी इंडिया और एंटी हिंदू कहा। हिंदू वोटर्स से जुड़े संगठनों ने लेबर पार्टी को वोट न देने की कसम खाई। साल 2019 में लेबर पार्टी को 1935 के बाद सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा जिसके बाद कॉर्बिन को पद से हटा दिया गया। इसके बाद जब 2020 में कीर स्टार्मर लेबर पार्टी के नेता बने तो उन्होंने हिंदू वोटरों की नाराजगी खत्म करने की कोशिश की और कश्मीर मुद्दे पर पार्टी का स्टैंड बदला। उन्होंने अनुच्छेद 370 खत्म करने को भारतीय संसद का मुद्दा बताया। स्टार्मर ने कहा कि कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है जिसे भारत और पाकिस्तान को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहिए। कश्मीर मुद्दे पर पार्टी के बदले स्टैंड का हिंदू संगठनों ने स्वागत किया। इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन में हिंदू मतदाताओं को रिझाने के लिए मंदिरों के भी दौरे किए। हाल ही में उन्होंने चुनाव से महज 6 दिन पहले लंदन में एक मंदिर का दौरा किया था और मंदिर को करुणा का प्रतीक बताया था। कीर स्टार्मर भारत के साथ संबंध बेहतर करने के पक्षधर हैं। उन्होंने पिछले साल इंडिया ग्लोबल फोरम में भारत-UK संबंधों को लेकर कहा कि उनकी लेबर सरकार भारत के साथ बेहतर संबंध बनाएगी। उन्होंने कहा- मेरे पास आप सभी के लिए एक साफ संदेश है। यह एक बदली हुई लेबर पार्टी है। स्टार्मर ने कहा कि उनकी सरकार बनने पर वह भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू करेंगे।

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