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प्राइस की ताजा रिपोर्ट:देश में मुस्लिमों की सालाना कमाई 28%, हिंदुओं की 19%, सिखों की सर्वाधिक 57% बढ़ी

हिंदू-मुस्लिम परिवारों के बीच ‘आय’ का अंतर तेजी से कम हो रहा है। दोनों समुदायों के परिवारों में यह अंतर 7 साल में 87% घटकर केवल 250 रुपए बचा है, जो 2016 में 1,917 रु./मासिक था। गैर मुनाफे वाली संस्था पीपुल्स रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी (प्राइस) के सर्वे में ये आंकड़े सामने आए। देश में मुस्लिमों की सालाना कमाई 28%, हिंदुओं की 19 फीसदी, सिखों की सर्वाधिक 57 फीसदी बढ़ी है। इस इकोनॉमिक थिंक टैंक ने यह सैंपल सर्वे देश के 165 जिलों के 1,944 गांवों के 2,01,900 परिवारों के बीच किया। मुस्लिम परिवारों की सालाना आय सात साल में 2.73 लाख रुपए से 27.7% बढ़कर 3.49 लाख रु. हो गई। इस दौरान हिंदुओं की आय 2.96 लाख रुपए से 18.8% बढ़कर 3.52 लाख रु. हो गई। प्राइस के अनुसार, पहले से ज्यादा कमा रहे लोगों की तुलना में आर्थिक रूप से कमजोर तबके की आय में तुलनात्मक दृष्टि से ज्यादा इजाफा हुआ है। कोविड से पहले देश के सबसे कम आय वाले 20% लोगों की देश की आय में हिस्सेदारी महज 3% थी, जो 2022-23 में बढ़कर 6.5% हो गई। इसकी तुलना में शीर्ष 20% आय वर्ग की हिस्सेदारी 52% से घटकर 45% ही बची। ऊपरी तबके की आय में जो हिस्सेदारी घटी, उससे गरीब और मध्यवर्ग की आय में बढ़ोतरी हुई। इसका फायदा सभी वर्गों को हुआ। सरकार की मुफ्त अनाज योजना, किसान सम्मान निधि और आवास योजनाओं ने भी सामाजिक-आर्थिक अंतर को कुछ हद तक कम करने में अहम भूमिका निभाई। अल्पसंख्यक खासतौर पर मुस्लिम वर्ग आर्थिक रूप से कमजोर तबके में आते हैं। इसलिए निचले तबके के तुलनात्मक उत्थान में मुस्लिम परिवारों को ज्यादा लाभ हुआ है।

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