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भास्कर ओपिनियन:ओम बिरला को स्पीकर चुनकर भाजपा ने कई संकेत दिए

वही हुआ जो भाजपा और नई केंद्र सरकार चाहती थी। आख़िर अठारहवीं लोकसभा का अध्यक्ष सत्ता पक्ष से ही चुना गया। वह भी वे ही ओम बिरला जो सत्रहवीं लोकसभा के अध्यक्ष भी थे। हालाँकि लगातार तीसरी बार चुनी गई नरेंद्र मोदी सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार के दिन ही इसके संकेत दे दिए थे जब वरिष्ठ सांसद ओम बिरला को मंत्री नहीं बनाया गया था। हालाँकि राजनीतिक बहस में यह बात बार- बार चलती रही कि चंद्रबाबू नायडू ने स्पीकर का पद टीडीपी को देने की शर्त पहले ही रख दी है और वे इससे कम पर कुछ भी मानने को तैयार नहीं होंगे। फिर बात चली कि भाजपा कोई बीच का रास्ता निकालने पर सोच रही है। दरअसल, आंध्र प्रदेश की भाजपा अध्यक्ष पुरंदेश्वरी हैं। वे चंद्रबाबू की साली यानी नंदमूरि तारक रामाराव की छोटी बेटी हैं। कहा जाने लगा कि भाजपा उन्हें स्पीकर बना सकती है। इस नाम पर चंद्रबाबू भी असहमति नहीं दे पाएंगे। आखिर तमाम कयास, बहस और अफ़वाहें निराधार साबित हो गईं। ओम बिरला ही फिर से लोकसभा अध्यक्ष चुन लिए गए। ऐसा करते मोदी सरकार ने कई संकेत दिए। पहला तो ये कि वह किसी गठबंधन दबाव में आने वाली नहीं है। दूसरा- दबाव में आकर विपक्षी कोई माँग भी नहीं मानेगी। तीसरा अकेली भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं होने के बावजूद सरकार अपने काम निर्बाध रूप से करती रहेगी। कांग्रेस के बलराम जाखड के बाद बिरला ऐसे लोकसभा अध्यक्ष हैं जो इस पद पर लागातार दूसरी बार चुने गए हैं। ये बात अलग है कि वर्षों से आम सहमति के साथ होने वाले इस पद के चुनाव की परम्परा इस बार टूट गई। दरअसल, दस साल बाद पहली बार विपक्ष मजबूत स्थिति में आया है इसलिए वह हर राजनीतिक और संसदीय गतिविधि में अपनी मज़बूत स्थिति को दर्शाने के प्रयास करेगा जिसकी शुरूआत उसने स्पीकर चुनाव से कर दी है। जैसे ही ओम बिरला का नाम सामने आया। विपक्षी नेताओं ने माँग रखी कि लोकसभा उपाध्यक्ष पद हमें दिया जाए तो ही हम स्पीकर के नाम पर सहमति देंगे। भाजपा यह जोखिम उठाने के पक्ष में नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि केरल से कांग्रेस सांसद के सुरेश को विपक्ष की ओर से स्पीकर पद का प्रत्याशी बनाया गया। हालाँकि उनका हारना तय था लेकिन विपक्ष ने अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराने के लिए चुनाव को ही प्राथमिकता दी। खैर, उधर लम्बी प्रतीक्षा बाद आखिर राहुल गांधी पहली बार किसी संवैधानिक पद को स्वीकारने के लिए राज़ी हो गए। इंडिया गठबंधन समझता है कि इस वक्त उसकी ओर से एग्रेसिव लीडर राहुल गांधी ही है। यही वजह है कि गठबंधन ने राहुल को विपक्ष का नेता चुन लिया।

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